Meaning and Interpretation of the word "Hindu"

There is false narrative published and propagated that the word "Hindu" was given by foreign invaders.

"हिन्दू" शब्द आदिशास्त्र "श्रीमद्भगवद्गीता" से लिया गया है।"हिन्दू"शब्द "हि" - हिय अर्थात् हृदय और "इन्दु" अर्थात् चन्द्रमा से मिलकर बना है। "श्रीमद्भगवद्गीता" में "परमात्मा" श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस जगतरूपी रात्रि में सभी प्राणी अचेत पड़े हैं। इन सबके हृदय में "परमात्मा" 'चन्द्रमा' के क्षीण प्रकाश के रूप में विद्यमान हैं।

अध्याय 13, श्लोक 17

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ।।
परमात्मा कृष्ण कहते हैं- वह ज्ञेय ब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति है, तम से अति परे कहा जाता है। वह पूर्ण ज्ञानस्वरूप है, पूर्ण ज्ञाता है, जानने योग्य है और ज्ञान द्वारा ही प्राप्त होने वाला है। साक्षात्कार के साथ मिलनेवाली जानकारी का नाम ज्ञान है। ऐसी जानकारी द्वारा ही उस ब्रह्म का प्राप्त होना सम्भव है। वह सबके हृदय में स्थित है।उसका निवास स्थान हृदय है। अन्यत्र ढूँढ़ने पर वह नहीं मिलेगा। अतः हृदय में ध्यान तथा योगाचरण द्वारा ही उस ब्रह्म की प्राप्ति का विधान है।

अध्याय 15, श्लोक 15

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।
परमात्मा श्रीकृष्ण कहते हैं- मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ। मुझसे ही स्वरूप की स्मृति (सुरति, जो तत्त्व परमात्मा विस्मृत है उसका स्मरण हो आना) होती है। (प्राप्तिकाल का चित्रण है) स्मृति के साथ ही ज्ञान (साक्षात्कार) और 'अपोहनं' अर्थात् बाधाओं का शमन मुझ इष्ट से ही होता है। सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ। वेदान्त का कर्त्ता अर्थात् 'वेदस्य अन्तः सः वेदान्त' (अलग था तभी तो जानकारी हुई। जब जानते ही उसी स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गया, तो कौन किसको जाने?) वेद की अन्तिम स्थिति का कर्त्ता मैं ही हूँ और 'वेदवित्' अर्थात् वेद का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।

अध्याय 18, श्लोक 61

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ।।
परमात्मा श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन ! वह ईश्वर सम्पूर्ण भूतप्राणियों के हृदय-देश में निवास करता है। इतना समीप है तो लोग जानते क्यों नहीं? मायारूपी यन्त्र में आरूढ़ होकर सबलोग भ्रमवश चक्कर लगाते ही रहते हैं, इसलिये नहीं जानते। यह यन्त्र बड़ा बाधक है, जो बार-बार नश्वर कलेवरों (शरीरों) में घुमाता रहता है।

अध्याय 9, श्लोक 20

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।।
परमात्मा श्रीकृष्ण कहते हैं- आराधना-विद्या के तीनों अंग-ऋक्, साम और यजुः अर्थात् प्रार्थना, समत्व की प्रक्रिया और यजन का आचरण करने वाले, सोम अर्थात् चन्द्रमा के क्षीण प्रकाश को पानेवाले पाप से मुक्त होकर पवित्र हुए पुरुष उसी यज्ञ की निर्धारित प्रक्रिया द्वारा मुझे इष्टरूप में पूजकर स्वर्ग के लिये प्रार्थना करते हैं। यही असत् की कामना है, इससे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म होता है; जैसा पिछले श्लोक में योगेश्वर ने बताया। वे पूजते मुझे ही हैं, उसी निर्धारित विधि से पूजते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की याचना करते हैं। वे पुरुष अपने पुण्य के फलस्वरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं, अर्थात् वह भोग भी मैं ही देता हूँ।

निष्कर्ष

भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोकों से यह स्पष्ट है कि "हिन्दू " शब्द "परमात्मा " के निवास स्थान का परिचायक है। अतः सृष्टि में जो भी उस हृदयस्थित परमात्मा की आराधना करता है, वह "हिन्दू " है। भगवद्गीता में बतायी हुई विधि से योग, यज्ञ का आचरण करने पर हृदय स्थित परमात्मा का इन्दुवत् क्षीण प्रकाश ज्योतिर्मय परमात्मा के रूप में परिवर्तित हो जाता है