त्रिकाल सन्ध्या - प्रातःकाल - (5 बजे) -

प्रातःकालीन सन्ध्या का समय प्रातःकाल 3:45 बजे से लेकर 6:30 बजे तक होता है। प्रातःकालीन सन्ध्या प्रातःकाल 3:45 बजे के पश्चात् जितना शीघ्र किया जाए उतना अधिक लाभकारी होता है। मंदिर एवं आश्रम में सामूहिक प्रातःकालीन सन्ध्या का आयोजन प्रतिदिन प्रातः काल 5:00 बजे किया जाना उचित होगा। हम सभी को सम्पूर्ण परिवार के साथ अपने समीप के मन्दिर, आश्रम, पार्क अथवा किसी व्यक्ति के घर पर एकत्रित होकर सामूहिक रूप से प्रातःकालीन सन्ध्या (परमात्मा की आराधना-प्रार्थना) का पालन निम्न विधि से करना चाहिए-

  • क- शंख ध्वनि के पश्चात् सामूहिक रूप से प्रातः कालीन त्रिकाल सन्ध्या का अनुष्ठान करें।
  • ख- ओम का उच्चारण करते समय इसी पाठ्यक्रम के अगले पृष्ठ पर वर्णित ध्यान की अवस्था को समझ कर उसी के अनुरूप बैठकर ओम का उच्चारण करें।
  • ग- तत्पश्चात् भगवद्गीता के पाँच श्लोकों (क्रमशः अध्याय 1 से अध्याय 18 तक) का सामूहिक पाठ अर्थ के साथ करें।
  • घ- तत्पश्चात् सामूहिक रूप से भगवद्गीता में वर्णित परमात्मा की निम्नलिखित प्रार्थना करें।
  • ङ- किसी कारणवश यदि आप प्रातःकालीन सामूहिक त्रिकाल सन्ध्या में सम्मिलित न हो सकें तो अपने घर पर या जिस भी स्थान पर हों वहाँ पर उसका अनुष्ठान करें।

परमात्मा की सर्वोत्कृष्ट प्रार्थना (प्रातः कालीन त्रिकाल सन्ध्या एवं अपरान्ह के समय त्रिकाल सन्ध्या के लिए)

(अध्याय-11 श्लोक सं0- 36 से 46 तक)

“परमात्मा के विराट स्वरूप का दर्शन करने के पश्चात् भयभीत, कांपते हुए अर्जुन ने श्रद्धापूर्वक गदगद वाणी से अध्याय-11 के श्लोक सं- 36 से 46 तक परमात्मा की प्रार्थना किया। अर्जुन की प्रार्थना सुनकर परमात्मा प्रसन्न हुए एवं पुनः अपने सौम्यस्वरूप में आ गए। अतः हम सबको भी परमात्मा की इस सर्वोत्कृष्ट प्रार्थना को भली प्रकार समझ कर स्मृति में धारण कर लेना चाहिए तथा प्रतिदिन स्वयं परमात्मा की यह प्रार्थना करना चाहिए तथा परिवार के एवं समाज के प्रत्येक व्यक्ति को यह प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।


अध्याय-11, श्लोक-36

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च |
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्गाः || 36||

हृषीकेश = हे हृषीकेश ! स्थाने = यह योग्य ही है (कि), तव = आपके, प्रकीर्त्या = नाम-गुण और प्रभाव के कीर्तन से, जगत् = जगत्, प्रहृष्यति = अति हर्षित हो रहा है, च = और, अनुरज्यते = अनुराग को भी प्राप्त हो रहा है (तथा), भीतानि = भयभीत, रक्षांसि = राक्षसलोग, दिशः = दिशाओं में, द्रवन्ति = भाग रहे हैं, च = और, सर्वे = सब, सिद्धसङ्घाः = सिद्धगणों के समुदाय, नमस्यन्ति नमस्कार कर रहे हैं।

हे हृषीकेश! यह उचित ही है कि आपकी कीर्ति से संसार हर्षित होता है और अनुराग को प्राप्त होता है। आपकी ही महिमा से भयभीत हुए राक्षस दिशाओं में भागते हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय आपकी महिमा को देखकर नमस्कार करते हैं।

अध्याय-11, श्लोक-37

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।
अनंत देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसतत्परं यत् || 37||

महात्मन् - हे महात्मन् ! ब्रह्मण: ब्रह्मा के, अपि भी, आदिकर्त्र आदिकर्ता, च = और, गरीयसे = सबसे बड़े, ते आपके लिए (ये), कस्मात्- कैसे, न, नमेरन् नमस्कार न करें (क्योंकि), अनन्त - हे अनन्त ! देवेश हे देवेश! जगन्निवास हे जगन्निवास ! यत् जो, सत् सत्,

असत्- असत् (और), तत्परम् उनसे परे, अक्षरम् अक्षर अर्थात् सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, (तत) = वह, त्वम् - आप (ही है)।

हे महात्मन् ! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिये ये सब कैसे नमस्कार न करें; क्योंकि हे अनन्त ! हे देवेश! हे जगन्निवास! सत्, असत् और उनसे भी परे अक्षर अर्थात् अक्षय स्वरूप आप ही हैं। अर्जुन ने अक्षय स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन किया था। केवल बौद्धिक स्तर पर कल्पना करने या मान लेने मात्र से कोई ऐसी स्थिति नहीं मिलती, जो अक्षय हो। अर्जुन का प्रत्यक्ष दर्शन उसकी आन्तरिक अनुभूति है। उसने सविनय कहा-


अध्याय-11, श्लोक-38

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण-स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् |
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप || 38||

त्वम् - आप, आदिदेवः आदिदेव (और), पुराणः सनातन, पुरुषः पुरुष हैं, त्वम्- आप, अस्य = इस, विश्वस्य = जगत् के, परम् परम, निधानम्- आश्रय, च और, वेत्ता जानने वाले, च = तथा, वेद्यम् = जानने योग्य (और), परम् परम, धाम-धाम, असि हैं। अनन्तरूप- हे अनन्तरूप! त्वया- आपसे (यह सब), विश्वम् जगत्, ततम् व्याप्त अर्थात् परिपूर्ण है। आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं। आप इस जगत् के परम आश्रय और जाननेवाले हैं, जानने योग्य हैं तथा परमधाम हैं। हे अनन्तस्वरूप ! आपसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। आप सर्वत्र है।


अध्याय-11, श्लोक-39

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्त्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥39॥

त्वम् = आप, वायुः = वायु, यमः = यमराज, अग्निः- अग्नि, वरुणः- वरुण, शशाङ्कः- चन्द्रमा, प्रजापतिः = प्रजा के स्वामी ब्रह्मा, च = और, प्रपितामहः = ब्रह्मा के भी पिता हैं। ते = आपके लिए, सहस्रकृत्वः = हजारों बार, नमः = नमस्कार! नमः = नमस्कार, अस्तु = हो, ते = आपके लिए, भूयः = फिर, अपि-भी, पुनः च बार-बार, नम := नमस्कार ! नम := नमस्कार।

आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा तथा प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। आपको हजारों बार नमस्कार है। फिर भी बार-बार नमस्कार है। अतिशय श्रद्धा और भक्ति के कारण नमन करते हए अर्जन को तप्ति नहीं हो रही है। वह कहता है


अध्याय-11, श्लोक-40

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनंतवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः || 40||

अनन्तवीर्य - हे अनन्त सामर्थ्य वाले! ते आपके लिए, पुरस्तात् आगे से, अथ और, पृष्ठतः = पीछे से भी, नमः नमस्कार। सर्व हे सर्वात्मन्, ते आपके लिए, सर्वतः सब ओर से, एव ही, नमः = नमस्कार, अस्तु = हो। (क्योंकि), अमितविक्रमः अनन्त पराक्रमशाली, त्वम् - आप, सर्वम् - सब संसार को, समाप्नोषि व्याप्त किए हुए हैं, ततः इससे (आप ही), सर्व = सर्वरूप, असि = हैं।

हे अत्यन्त सामर्थ्यवाले! आपको आगे से और पीछे से भी नमस्कार हो। हे सर्वात्मन् ! आपको सब ओर से ही नमस्कार हो; क्योंकि हे अत्यन्त पराक्रमशाली! आप सब ओर से संसार को व्याप्त किये हुए हैं, इसलिये आप ही सर्वरूप और सर्वत्र हैं। इस प्रकार बारम्बार नमस्कार करके भयभीत अर्जुन अपनी भूलों के लिये क्षमायाचना करता है-


अध्याय-11, श्लोक-41

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति |
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि || 41||

तव = आपके, इदम् = इस, महिमानम् प्रभाव को, अजानता न जानते हुए, (आप मेरे), सखा-सखा हैं, इति ऐसा, मत्वा मानकर, प्रणयेन प्रेम से, वा अथवा, प्रमादात् = प्रमाद से, अपि = भी, मया = मैने, हे कृष्ण 'हे कृष्ण!' हे यादव 'हे यादव!' हे सखे 'हे सखे!' इति इस प्रकार, यत् = जो (कुछ बिना सोच-समझे), प्रसभम् हठात् उक्तम् - कहा है।

आपके इस प्रभाव को न जानते हुए आपको सखा, मित्र मानकर मेरे द्वारा प्रेम अथवा प्रमाद से भी हे कृष्ण!, हे यादव!, हे सखे ! इस प्रकार जो कुछ भी हठपूर्वक कहा गया है तथा-


अध्याय-11, श्लोक-42

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ।।42॥

च = और, अच्युत = हे अच्युत ! (आप), यत्- जो (मेरे द्वारा), अवहासार्थम् विनोद के लिए, विहारशय्यासनभोजनेषु विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में, एक अकेले, अथवा = अथवा, तत्समक्षम् उन सखाओं के सामन, अपि भी, असत्कृतः अपमानित किये गए, असि = है- तत् = वह (सब अपराध), अप्रमेयम् अप्रमेयस्वरूप अर्थात् अचिन्त्य प्रभाव वाले, त्वाम्- आपसे, अहम् - मैं, क्षामये क्षमा करवाता हूँ। = हे अच्युत ! जो आप हँसी के लिये विहार, शय्या, आसन और भोजनादिकों में अकेले अथवा उन लोगों के सामने भी अपमानित किये गये हैं, वह सब अपराध अचिन्त्य प्रभाववाले आपसे मैं क्षमा कराता हूँ। किस प्रकार क्षमा करें?-


अध्याय-11, श्लोक-43

पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ।।43॥

त्वम् = आप, अस्य = इस, चराचरस्य चराचर, लोकस्य जगत् के, पिता = पिता, च = और, गरीयान् = सबसे बड़े, गुरुः गुरु (एवं), पूज्यः अति पूजनीय, असि हैं, अप्रतिमप्रभाव = हे अनुपम प्रभाववाले ! लोकत्रये तीनों लोकों में, त्वत्समः = आपके समान, अपि-भी, अन्यः दूसरा कोई, न नहीं, अस्ति है, (फिर), अभ्यधिकः = अधिक (तो), कुतः = कैसे हो सकता है।

आप इस चराचर जगत् के पिता, गुरु से भी बड़े गुरु और अति पूजनीय हैं। जिसकी कोई प्रतिमा नहीं, ऐसे अप्रतिम प्रभाव वाले ! आपके समान तीनों लोकों में दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक कैसे होगा? आप सखा भी नहीं, सखा तो समकक्ष होता है।


अध्याय-11, श्लोक-44

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ।।44।।

= तस्मात् - अत एव (प्रभो!), अहम् मैं, कायम् = शरीर को, प्रणिधाय = भलीभाँति चरणों में निवेदित कर, प्रणम्य = प्रणाम करके, ईड्यम्- स्तुति करने योग्य त्वाम् आप, ईशम् = ईश्वर को, प्रसादये प्रसन्न होने के लिए प्रार्थना करता हूँ। देव हे देव! पिता = पिता, इव = जैसे, पुत्रस्य = पुत्र के, सखा सखा, इव जैसे, सख्युः सखा के (अपराध सहन करते हैं, वैसे ही, प्रियः अतिप्रिय तुम, प्रियाय मुझ प्रिय भक्त के लिए (सब अपराधों को) सोढम सहन करने, अर्हसि - योग्य हैं।

आप चराचर के पिता हैं, इसलिये मैं अपने शरीर को भली प्रकार आपके चरणों में रखकर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिये प्रार्थना करता हूँ। हे देव! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रिय स्त्री के अपराधों को क्षमा करता है, वैसे ही आप भी मेरे अपराधों को सहन करने योग्य हैं। अपराध क्या था? हमने कभी हे यादव !, हे सखे !, हे कृष्ण ! कहा था। समाज के बीच अथवा एकान्त में कहा था, भोजन के समय अथवा सोने के समय कहा था। क्या कृष्ण कहना अपराध था? काले थे ही, गोरे कैसे कहे जाते? यादव कहना भी अपराध नहीं था, क्योंकि यदकुल में तो जन्म ही हुआ था। सखा कहना भी अपराध नहीं था; क्योंकि स्वयं श्रीकृष्ण भी अपने को अर्जुन का सखा मानते थे। जब कृष्ण कहना अपराध ही है, एक बार कृष्ण कहने के लिये अर्जुन अनन्त बार गिड़गिड़ाकर क्षमायाचना कर रहा है, तो जप किसका करें? नाम कौन-सा लें? वस्तुतः चिन्तन का जैसा विधान स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया है, वैसा ही आप करें। उन्होंने पीछे बताया, 'ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।'- अर्जुन ! 'ॐ' बस इतना ही अक्षय ब्रह्म का परिचायक है, इसका तू जप कर और ध्यान मेरा धर; क्योंकि उस परमभाव में प्रवेश मिल जाने के पश्चात् उन महापुरुष का भी वही नाम है, जो उस अव्यक्त का परिचायक है। प्रभाव देखने पर अर्जुन ने पाया कि ये न तो काले हैं न गोरे, न सखा हैं न यादव, यह तो अक्षय ब्रह्म की स्थिति वाले महात्मा हैं।

सम्पूर्ण गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने सात स्थलों पर ओम् के उच्चारण पर बल दिया। अब यदि आपको जप करना है तो कृष्ण-कृष्ण न कहकर ओम् का ही जप करें। प्रायः भाविक लोग कोई-न-कोई रास्ता निकाल लेते हैं। कोई 'ओम्' जपने के अधिकार और अनधिकार की चर्चा से भयभीत है, तो कोई महात्माओं की दुहाई देता है अथवा कोई श्रीकृष्ण ही नहीं, उनसे पहले राधा और गोपियों का नाम भी उनकी शीघ्र प्रसन्नता के लोभमें जपता है। पुरुष श्रद्धामय है इसलिये उसका ऐसा जपना मात्र भावुकता है। यदि आप सचमुच भाविक हैं तो उनके आदेश का पालन करें। वे अव्यक्त में स्थित होते हुए भी आज आपके सामने नहीं हैं लेकिन उनकी वाणी आपके समक्ष है। उनकी आज्ञा का पालन करें अन्यथा आप ही बताइये कि गीता में आपका क्या स्थान हैं? हाँ, इतना अवश्य है कि 'अध्येष्यते च य इममं....... श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।'- जो अध्ययन करता है, सुनता है वह ज्ञान तथा यज्ञ को जान लेता है, शुभ लोकों को पा जाता है। अतः अध्ययन अवश्य करें। प्राण-अपान के चिन्तन में 'कृष्ण' नाम का क्रम पकड़ में नहीं आता। बहुत से लोग कोरी भावुकतावश केवल 'राधे-राधे' कहने लगे हैं। आजकल अधिकारियों से काम न होने पर उनके सगे-सम्बन्धियों से, प्रेमी या पत्नी से 'सोर्स' लगाकर काम चला लेने की परम्परा है। लोग सोचते हैं कि कदाचित् भगवान के घर में भी ऐसा चलता होगा, अतः उन्होंने 'कृष्ण' कहना बन्द करके 'राधे-राधे' कहना आरम्भ कर दिया। वे कहते हैं- 'राधे-राधे ! श्याम मिला दे।' राधा एक बार बिछुड़ी तो स्वयं श्याम से नहीं मिल पायी, वह आपको कैसे मिला दे? अतः अन्य किसी का कहना न मानकर श्रीकृष्ण के आदेश को आप अक्षरशः मानें, ओम् का जप करें। हाँ, यहाँ तक उचित है कि राधा हमारा आदर्श हैं, उतनी ही लगन से हमें भी लगना चाहिये। यदि पाना है तो राधा की तरह विरही बनना है। आगे भी अर्जुन ने 'कृष्ण' कहा। 'कृष्ण' उनका प्रचलित नाम था। ऐसे कई नाम थे, जैसे- 'गोपाल'। बहुत से साधक गुरु-गुरु या गुरु का प्रचलित नाम भावुकतावश जपना चाहते हैं; किन्तु प्राप्ति के पश्चात् प्रत्येक महापुरुष का वही नाम है, जिस अव्यक्त में वह स्थित है। बहुत से शिष्य प्रश्न करते हैं- "गुरुदेव! जब ध्यान आपका करते हैं तो पुराना नाम 'ओम्' इत्यादि क्यों जपें, 'गुरु-गुरु' अथवा 'कृष्ण-कृष्ण' क्यों न कहें।" किन्तु यहाँ योगेश्वर ने स्पष्ट किया कि अव्यक्त स्वरूप में विलय के साथ महापुरुष का भी वही नाम है, जिसमें वह स्थित है। 'कृष्ण' सम्बोधन था, जपने का नाम नहीं। योगेश्वर श्रीकृष्ण से अर्जुन ने अपने अपराधों के लिये क्षमायाचना की, उन्हें स्वाभाविक रूप में आने की प्रार्थना की। श्रीकृष्ण मान गये, सहज हो गये अर्थात् उसे क्षमा भी कर दिया। उसने निवेदन किया-


अध्याय-11, श्लोक-45

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देवरुपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥45॥

= अदृष्टपूर्वम् = पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को, दृष्ट्वा = देखकर, हृषितः = हर्षित, अस्मि हो रहा हूँ, च = और, मे मेरा, मनः मन, भयेन भय से, प्रव्यथितम् = अति व्याकुल भी हो रहा है; (इसलिए आप), तत् उस (अपने), देवरूपम् = विष्णुरूप को, एव= ही, मे = मुझे, दर्शय दिखलाइए। देवेश हे देवेश ! जगन्निवास = हे जगन्निवास ! प्रसीद प्रसन्न होइए।

अभी तक अर्जुन के समक्ष योगेश्वर विश्वरूप में हैं। अतः वह कहता है कि मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ तथा मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है। पहले तो सखा समझता था, धनुर्विद्या में कदाचित् अपने को कुछ आगे ही पाता था; किन्तु अब प्रभाव देखकर भयभीत हो रहा है। पिछले अध्याय में प्रभाव सुनकर वह अपने को ज्ञानी मानता था। क्या ज्ञानी को कहीं भय होता है? वस्तुतः प्रत्यक्ष दर्शन का प्रभाव ही विलक्षण होता है। सब कुछ सुन और मान लेने के बाद भी सब कुछ चलकर जानना शेष ही रहता है। वह कहता है- पहले न देखे हुए आपके इस रूप को देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ। मेरा मन भय से व्याकुल भी हो रहा है। अतः हे देव! आप प्रसन्न हों। हे देवेश! हे जगन्निवास ! आप अपने उस रूप को ही मुझे दिखाइये। कौन-सा रूप?-


अध्याय-11, श्लोक-46

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त-मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥46॥

अहम् = मैं, तथा = वैसे, एव ही, त्वाम् आपको, किरीटिनम् = मुकुट धारण किए हुए (तथा), गदिनम्, चक्रहस्तम् = गदा और चक्र हाथ में लिए हुए, द्रष्टुम् = देखना, इच्छामि = चाहता हूँ, विश्वमूर्ते = इसलिए, विश्वमूर्ते हे विश्वस्वरूप ! सहस्रबाहो = हे सहस्रबाहो! (आप), तेन एव = उसी चतुर्भुजेन रूपेण चतुर्भुजरूपसे (प्रकट), भव = होइए। मैं आपको वैसे ही अर्थात् पहले की ही तरह शिर पर मुकुट धारण किये हुए, हाथ में गदा और चक्र लिये हुए देखना चाहता हूँ। इसलिये हे विश्वरूपे ! हे सहस्रबाहो ! आप अपने उसी चतुर्भुज स्वरूप में होइए।

"उपर्युक्त प्रार्थना परमात्मा की सम्पूर्ण प्रार्थना है, जब अर्जुन ने यह प्रार्थना किया तब परमात्मा अपने विराट स्वरूप में थे। अर्जुन परमात्मा के विराट स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन कर रहा था। अर्जुन की प्रार्थना सुनकर परमात्मा प्रसन्न हुए। अतः परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए हमें भी भगवद्गीता में वर्णित यह प्रार्थना करनी चाहिए।"