परमात्मा की सायं कालीन प्रार्थना - सायं काल 6:30 बजे

अध्याय 11, श्लोक 15

अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ।।१५।।
हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर बैठे हुए ब्रह्मा को, महादेव को, सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ। यह प्रत्यक्ष दर्शन था, कोरी कल्पना नहीं; किन्तु ऐसा तभी सम्भव है जब योगेश्वर, पूर्णत्व प्राप्त महापुरुष हृदय से दृष्टि प्रदान करें। यह साधनगम्य है।

अध्याय 11, श्लोक 16

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ।। १६ ।।
विश्व के स्वामी ! मैं आपको अनेक हाथ, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपोंवाला देखता हूँ। हे विश्वरूप ! न मैं आपके आदि को, न मध्य को और न अन्त को ही देखता हूँ अर्थात् आपके आदि, मध्य और अन्त का निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ।

अध्याय 11, श्लोक 17

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता-
द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ।।१७।।
मैं आपको मुकुटयुक्त, गदायुक्त, चक्रयुक्त, सब ओर से प्रकाशमान तेजपुंज स्वरूप, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश देखने में दुष्कर अर्थात् कठिनाई से देखा जानेवाला और सब ओर से बुद्धि आदि से ग्रहण न हो सकनेवाला अप्रमेय देखता हूँ। इस प्रकार सम्पूर्ण इन्द्रियों से पूर्णतया समर्पित होकर योगेश्वर श्रीकृष्ण को इस रूप में देखकर अर्जुन उनकी स्तुति करने लगा-

अध्याय 11, श्लोक 18

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ।।१८।।
भगवन् ! आप जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् अक्षय परमात्मा हैं, आप इस जगत् के परम आश्रय हैं, आप शाश्वत धर्म के रक्षक हैं तथा आप अविनाशी सनातन पुरुष हैं- ऐसा मेरा मत है। आत्मा का स्वरूप क्या है? शाश्वत है, सनातन है, अव्यक्त रूप है, अविनाशी है। यहाँ श्रीकृष्ण का क्या स्वरूप है? वही शाश्वत, सनातन, अव्यय, अविनाशी अर्थात् प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष भी उसी आत्मभाव में स्थित होता है। तभी तो भगवान और आत्मा एक ही लक्षणवाले हैं।

अध्याय 11, श्लोक 19

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।। १९ ।।
हे परमात्मन् ! मैं आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त हाथोंवाला (पहले हजारों थे, अब अनन्त हो गये), चन्द्रमा और सूर्यरूपी नेत्रोंवाला (तब तो भगवान काने हो गये। एक आँख चन्द्रमा की तरह क्षीण प्रकाशवाली और दूसरी सूर्य की तरह सतेज। ऐसा कुछ नहीं है। सूर्य के समान प्रकाश प्रदान करनेवाला और चन्द्रमा की तरह शीतलता प्रदान करनेवाला गुण भगवान में है। शशि-सूर्य मात्र प्रतीक हैं। अर्थात् चन्द्रमा और सूर्य की दृष्टिवाले) तथा प्रज्वलित अग्निरूपी मुखवाला तथा अपने तेज से इस जगत् को तपाते हुए देखता हूँ।

अध्याय 11, श्लोक 20

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्टवाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ।। २० ।।
हे महात्मन् ! अन्तरिक्ष और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एकमात्र आपसे ही परिपूर्ण हैं। आपके इस अलौकिक, भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अत्यन्त व्यथित हो रहे हैं।

अध्याय 11, श्लोक 21

अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ।। २१ ।।
वे देवताओं के समूह आपमें ही प्रवेश कर रहे हैं और कई एक भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके गुणों का गान कर रहे हैं। महर्षि और सिद्धों के समुदाय स्वस्तिवाचन अर्थात् 'कल्याण हो', ऐसा कहते हुए सम्पूर्ण स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं।

अध्याय 11, श्लोक 22

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ।। २२ ।।
रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, वायुदेव और 'उष्मपाः'- ईश्वरीय ऊष्मा ग्रहण करनेवाले तथा गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय सभी आश्चर्य से आपको देख रहे हैं अर्थात् देखते हुए भी समझ नहीं पा रहे हैं; क्योंकि उनके पास वह दृष्टि ही नहीं है। श्रीकृष्ण ने पीछे बताया कि आसुरी स्वभाववाले मुझे तुच्छ कहकर सम्बोधित करते हैं, सामान्य मनुष्य-जैसा मानते हैं जबकि मैं परमभाव में, परमेश्वर रूप में स्थित हूँ। यद्यपि हूँ मनुष्य-शरीर के आधारवाला। उसी का विस्तार यहाँ है कि वे आश्चर्य से देख रहे हैं, यथार्थतः समझ नहीं पा रहे हैं- नहीं देखते हैं।

अध्याय 11, श्लोक 23

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ।। २३ ।।
महाबाहु (श्रीकृष्ण महाबाहु हैं और अर्जुन भी। प्रकृति से परे महान् सत्ता में जिसका कार्यक्षेत्र हो, वह महाबाहु है। श्रीकृष्ण महानता के क्षेत्र में पूर्ण हैं, अधिकतम सीमा में हैं। अर्जुन उसी की प्रवेशिका में है, मार्ग में है। मंजिल मार्ग का दूसरा छोर ही तो है।) योगेश्वर ! आपके बहुत मुख और नेत्रोंवाले; बहुत हाथ, जंघा और पैरोंवाले; बहुत उदरोंवाले, अनेक विकराल दाढ़ोंवाले महान् रूप को देखकर सब लोक व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ। अब अर्जुन को कुछ भय हो रहा है कि श्रीकृष्ण इतने महान् हैं।

अध्याय 11, श्लोक24

नभः स्पृश दीप्तमनेकवर्णं
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ।। २४ ।।
विश्व में सर्वत्र अणुरूप से व्याप्त हे विष्णो ! आकाश को स्पर्श किये हुए, प्रकाशमान, अनेक रूपों से युक्त, फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर विशेष रूप से भयभीत अन्तःकरणवाला मैं धैर्य और मन के समाधानरूपी शान्ति को नहीं पा रहा हूँ।

अध्याय 11, श्लोक 25

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास ।। २५ ।।
आपके विकराल दाढ़ोंवाले और कालाग्नि (काल के लिये भी अग्नि है परमात्मा) के समान प्रज्वलित मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जान पा रहा हूँ। चारों ओर प्रकाश देखकर दिशाभ्रम हो रहा है। आपका यह रूप देखते हुए मुझे सुख भी नहीं मिल रहा है। हे देवेश! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न हों।

अध्याय 11, श्लोक 26

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः
सर्वे सहैवावनिपालसङ्घै:।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ।। २६ ।।
वे सब ही धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदायसहित आपमें प्रवेश कर रहे हैं और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण (जिससे अर्जुन बहुत भयभीत था, वह कर्ण) एवं हमारी ओर के भी प्रधान योद्धाओं सहित सब-के-सब-

अध्याय 11, श्लोक 27

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ।। २७।।
बड़े वेग से आपके विकराल दाढ़ोंवाले भयानक मुखों में प्रवेश कर रहे हैं तथा उनमें से कितने ही चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दिखायी पड़ रहे हैं। वे किस वेग से प्रवेश कर रहे हैं? अब उनका वेग देखें-

अध्याय 11, श्लोक 28

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ।। २८।।
जैसे नदियों के बहुत-से जल-प्रवाह (अपने में विकराल होते हुए भी) समुद्र की ओर दौड़ते हैं, समुद्र में प्रवेश करते हैं, ठीक उसी प्रकार वे शूरवीर मनुष्यों के समुदाय आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। अर्थात् वे अपने में शूरवीर तो हैं; किन्तु आप समुद्रवत् हैं। आपके समक्ष उनका बल अत्यल्प है। वे किसलिये और किस प्रकार प्रवेश कर रहे हैं? इसके लिये उदाहरण प्रस्तुत है-

अध्याय 11, श्लोक 29

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ।। २९ ।।
जैसे पतंगा नष्ट होने के लिये ही प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब प्राणी भी अपने नाश के लिये आपके मुखों में अत्यन्त बढ़े हुए वेग से प्रवेश कर रहे हैं।

अध्याय 11, श्लोक 30

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता-
ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं
भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ।। ३० ।।
आप उन समस्त लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा सब ओर से निगलते हुए चाट रहे हैं, उनका आस्वादन कर रहे हैं। हे व्यापनशील परमात्मन् ! आपकी उग्र प्रभा सम्पूर्ण जगत् को अपने तेज से व्याप्त करके तपा रही है। तात्पर्य यह है कि पहले आसुरी सम्पद् परमतत्त्व में विलीन हो जाती है, उसके पश्चात् दैवी सम्पद् का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता इसलिये वह भी उसी स्वरूप में विलीन हो जाती है। अर्जुन ने देखा कि कौरव-पक्ष, तदनन्तर उसके अपने पक्ष के योद्धा श्रीकृष्ण के मुखों में विलीन होते जा रहे हैं। उसने पूछा-

अध्याय 11, श्लोक 31

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ।। ३१ ।।
मुझे बताइये कि भयंकर आकारवाले आप कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ ! आपको नमस्कार है, आप प्रसन्न हों। आदिस्वरूप! मैं आपको भली प्रकार जानना चाहता हूँ (जैसे, आप कौन हैं? क्या करना चाहते हैं?); क्योंकि आपकी प्रवृत्ति अर्थात् चेष्टाओं को नहीं समझ पा रहा हूँ।