Important Shloks and principles
1- परमात्मा कहाँ रहते हैं?
"भगवद्गीता में स्वयं परमात्मा श्रीकृष्ण ने स्पष्ट बताया कि परमात्मा का निवास स्थान कहाँ है, परमात्मा कहाँ रहते हैं। परमात्मा जहाँ रहते हैं वहीं ढूंढने पर पमात्मा का दर्शन होगा, परमात्मा वहीं मिलेंगे। कहीं और ढूंढने पर परमात्मा नही मिलेंगे, केवल हमारा समय नष्ट होगा। भगवद्गीता के निम्नलिखित श्लोकों में परमात्मा श्री कृष्ण ने स्पष्ट बताया है कि परमात्मा कहाँ रहते हैं।"
अध्याय-18, श्लोक-61
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया || 61 ||
अर्जुनः हे अर्जुन ! यन्त्रारूढानि (इव) = यन्त्र पर आरूढ होकर, सर्वभूतानि सम्पूर्ण प्राणियों को, ईश्वरः अन्तर्यामी परमेश्वर, मायया अपनी माया से (उनके कर्मों के अनुसार), भ्रामयन् - भ्रमण किया हुआ, सर्वभूतानाम् = सब प्राणियों के, हृद्देशे = हृदय में, तिष्ठति = स्थित है।
अर्जुन ! वह ईश्वर सम्पूर्ण भूत प्राणियों (सम्पूर्ण जीवधारियों) के हृदय देश में निवास करता है। इतना समीप है, तो लोग जानते क्यों नहीं? मायारूपी यंत्र में आरूढ़ होकर सब लोग भ्रमवश चक्कर लगाते ही रहते हैं, इसलिए नही जानते, यह यंत्र बड़ा बाधक है। जो बार-बार नश्वर कलेवरों (शरीरों) में घुमाता रहता है, तो शरण किसकी लें?
अध्याय-18, श्लोक-62
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् || 62||
भारत = हे भारत ! (तू), सर्वभावेन सब प्रकार से, तम् उस परमेश्वर की, एव= ही, शरणम् = शरण में, गच्छ - जा। तत्प्रसादात् = उस परमात्मा की कृपा से (ही तू), पराम् = परम, शान्तिम् = शान्ति को (तथा), शाश्वतम् = सनातन, स्थानम् = परम धाम को, प्राप्स्यसि = प्राप्त होगा।
इसलिये हे भारत ! सम्पूर्ण भाव से उस ईश्वर की (जो हृदय-देश में स्थित है) अनन्य शरण को प्राप्त हो। उसके कृपा-प्रसाद से तू परमशान्ति, शाश्वत परमधाम को प्राप्त होगा। अतः ध्यान करना है तो हृदय-देश में करें। यह जानते हुए भी मन्दिर, मस्जिद, चर्च या अन्यत्र खोजना समय बरबाद करना है। हाँ, जानकारी नहीं है तब तक स्वाभाविक है। ईश्वर का निवास - स्थान हृदय है। भागवत के चतुः श्लोकी गीता का सारांश भी यही है कि वैसे तो मैं सर्वत्र हूँ; किन्तु प्राप्त होता हूँ तो हृदय-देश में ध्यान करने से ही।
"भगवद्गीता के उपरोक्त श्लोकों से स्पष्ट है कि परमात्मा सभी प्राणियों के हृदयदेश में निवास करते हैं। अतः परमात्मा का दर्शन और प्राप्ति भगवद्गीता में बतायी हुई विधि से हृदयदेश में ध्यान करने से होती है। बाहर ढूंढने से परमात्मा का दर्शन और प्राप्ति नही होगी। यहाँ यह भी स्पष्ट है कि परमात्मा सभी प्राणियों के हृदयदेश में रहते हैं। अतः सभी मनुष्य परमात्मा का दर्शन कर सकते हैं, प्राप्त कर सकते हैं।"
2. परमात्मा श्रीकृष्ण ने परमात्मा के किस नाम का जप करने का निर्देश दिया है?
भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट बताया कि परमात्मा के किस नाम का जप करना चाहिए-
अध्याय-8, श्लोक-13
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् || 13||
यः = जो पुरुष, ओम् = 'ॐ' इति इस, एकाक्षरम् = एक अक्षररूप, ब्रह्म- ब्रह्म को, व्याहरन् - उच्चारण करता हुआ (और उसके अर्थस्वरूप), माम् मुझ निर्गुण ब्रह्म का, अनुस्मरन् = चिन्तन करता हुआ, देहम् शरीर को, त्यजन् त्यागकर, प्रयाति जाता है, सः = वह पुरुष, परमामगतिम् परमगति को, याति प्राप्त होता है।
जो पुरुष 'ओम् इति'- ओम् इतना ही, जो अक्षय ब्रह्म का परिचायक है, इसका जप तथा मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग कर जाता है, वह पुरुष परमगति को प्राप्त होता है।
श्रीकृष्ण एक योगेश्वर, परमतत्त्व में स्थित महापुरुष, सद्गुरु थे। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि 'ओम्' अक्षय ब्रह्म का परिचायक है, तू इसका जप कर और ध्यान मेरा कर। प्राप्ति के हर महापुरुष का नाम वही होता है जिसे वह प्राप्त है, जिसमें वह विलय है इसलिये नाम ओम् बताया और रूप अपना। योगेश्वर ने 'कृष्ण-कृष्ण' जपने का निर्देश नहीं दिया लेकिन कालान्तर में भावुकों ने उनका भी नाम जपना आरम्भ कर दिया और अपनी श्रद्धा के अनुसार उसका फल भी पाते हैं; जैसा कि, मनुष्य की श्रद्धा जहाँ टिक जाती है वहाँ मैं ही उसकी श्रद्धा को पुष्ट करता तथा मैं ही फल का विधान भी करता हूँ। भगवान शिव ने 'राम' शब्द के जपने पर बल दिया। 'रमन्ते योगिनो यस्मिन् स रामः। "रा और म के बीच में कबिरा रहा लुकाय।' रा और म इन दो अक्षरों के अन्तराल में कबीर अपने मन को रोकने में सक्षम हो गये।
श्रीकृष्ण ओम् पर बल देते हैं। ओ अहं स ओम् अर्थात् वह सत्ता मेरे भीतर है, कहीं बाहर न ढूँढ़ने लगे। यह ओम् भी उस परम सत्ता का परिचय देकर शान्त हो जाता है। वास्तव में उन प्रभु के अनन्त नाम हैं; किन्तु जप के लिये वही नाम सार्थक है जो छोटा हो, श्वास में ढल जाय और एक परमात्मा का ही बोध कराता हो। उससे भिन्न अनेक देवी-देवताओं की अविवेकपूर्ण कल्पना में उलझकर लक्ष्य से दृष्टि न हटा दें।
"उपरोक्त श्लोकों से स्पष्ट है कि भगवद्गीता में परमात्मा श्रीकृष्ण ने परमात्मा के शास्वत् नाम "ॐ" का जप करने का निर्देश दिया है, किसी अन्य नाम का नही। परमात्मा श्रीकृष्ण ने सम्पूर्ण भगवद्गीता में स्वयं अपना भी नाम कृष्ण-कृष्ण जपने का निर्देश नही दिया। अपने किसी भक्त का या किसी देवी-देवता का भी नाम जपने का निर्देश नही दिया। जो महापुरूष भगवद्गीता में बतायी हुई यज्ञ की प्रक्रिया का, कर्म का, ध्यान का आचरण करके परमात्मा का साक्षात् दर्शन कर लेते हैं, परमात्मा को प्राप्त कर लेते हैं, वह उसी परमात्मा में स्थित हो जाते हैं, समाहित हो जाते हैं।
अतः प्राप्ति के पश्चात् उन महापुरूष का भी नाम "ऊँ" हो जाता है। वह स्वयं भी परमात्म स्वरूप, ब्रह्म स्वरूप हो जाते हैं। अतः हमें भगवान श्री कृष्ण द्वारा बताये हुए परमात्मा के नाम "ॐ" का जप करना चाहिए, किसी अन्य नाम का नही। "ॐ" अविनाशी, शास्वत्, सनातन्, ब्रह्म का परिचायक नाम है, सबसे छोटा नाम है, श्वास में ढल जाता है। अतः हमें परमात्मा के नाम "ऊँ" का जप करना चाहिए और परमात्मा को प्राप्त सद्गुरु के स्वरूप का ध्यान करना चाहिए।"
3- क्या एक मात्र परमात्मा की आराधना करने से मनुष्य की सम्पूर्ण कामनाएं पूर्ण हो जाती है?
अध्याय-7, श्लोक-16
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।।16।।
भरतर्षभ अर्जुन हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! सुकृतिनः उत्तम कर्म करने वाले, अर्थार्थी अर्थार्थी, आर्त आर्त, जिज्ञासु जिज्ञासु, च और, ज्ञानी ज्ञानी-(ऐसे), चतुर्विधाः = चार प्रकार के, जनाः भक्तजन, माम् मुझको, भजन्ते = भजते हैं।
हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन । 'सुकृतिनः'- उत्तम अर्थात् नियत कर्म (जिसके परिणाम में श्रेय की प्राप्ति हो, उसको) करनेवाले 'अर्थार्थी' अर्थात् सकाम, 'आर्तः' अर्थात् दुःख से छूटने की इच्छावाले, 'जिज्ञासुः' अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से जानने की इच्छावाले और 'ज्ञानी' अर्थात् जो प्रवेश की स्थिति में हैं- ये चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते हैं।
अर्थ वह वस्तु है, जिससे हमारे शरीर अथवा सम्बन्धों की पूर्ति हो। इसलिये अर्थ, कामनाएँ सब कुछ पहले तो भगवान द्वारा पूर्ण होती हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही पूर्ण करता हूँ; किन्तु इतना ही वास्तविक 'अर्थ' नहीं है। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है, यही अर्थ है। सांसारिक 'अर्थ' की पूर्ति करते-करते भगवान वास्तविक अर्थ आत्मिक सम्पत्ति की ओर बढ़ा देते हैं; क्योंकि वे जानते हैं कि इतने ही से मेरा भक्त सुखी नहीं होगा इसलिये वे आत्मिक सम्पत्ति भी उसे देने लगते हैं। 'लोक लाहु परलोक निबाहू।' (रामचरितमानस, १/१९/२)- लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह ये दोनों भगवान की वस्तुएँ हैं। अपने भक्त को खाली नहीं छोड़ते।
आर्त: '- जो दुःखी हो, 'जिज्ञासुः'- समग्रता से जानने की इच्छा वाले जिज्ञासु मुझे भजते हैं। साधना की परिपक्व अवस्था में दिग्दर्शन (प्रत्यक्ष दर्शन) की अवस्था वाले ज्ञानी भी मुझे भजते हैं। इस प्रकार चार प्रकार के भक्त मुझे भजते हैं, जिनमें ज्ञानी श्रेष्ठ है अर्थात् ज्ञानी भी भक्त ही है।
"सृष्टि में मनुष्य की केवल चार आवश्यकताएं हैं अथवा मनुष्य मूलतः चार चीजों की कामना करता है। 1- दुखों से मुक्त होना चाहता है, 2- अत्यधिक धन सम्पत्ति (अर्थ) चाहता है, 3- सृष्टि की सर्वोच्च सत्ता को जानना चाहता है एवं 4-सृष्टि की सर्वोच्च सत्ता को जानकर उसी में स्थित होना चाहता है। उपरोक्त श्लोकों से स्पष्ट है कि उपरोक्त सम्पूर्ण कामनाएं एक मात्र परमात्मा से पूर्ण हो जाती हैं। अतः सभी को नियत विधि (भगवद्गीता में बतायी हुई विधि) से एक मात्र परमात्मा की ही आराधना करनी चाहिए।"
4- क्या परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी देवी-देवता, महापुरूष, पीर, मजार इत्यादि की पूजा करनी चाहिए?
अध्याय-9, श्लोक-22
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् || 22||
ये = जो, अनन्या : अनन्य प्रेमी, जना: भक्तजन, माम्- मुझ परमेश्वर को, चिन्तयन्त := निरन्तर चिन्तन करते हुए, पर्युपासते निष्कामभाव से भजते हैं, तेषाम्- उन, नित्याभियुक्तानाम् = नित्य-निरन्तर मेरा चिन्तन करने वाले पुरुषों का, योगक्षेमम् = योगक्षेम, अहम् = मैं स्वयं, वहामि = प्राप्त करा देता हूँ।
अनन्य भाव से मुझमें स्थित भक्तजन मुझ परमात्मस्वरूप का निरन्तर चिन्तन करते हैं, 'पर्युपासते' लेशमात्र भी त्रुटि न रखकर मुझे उपासते हैं। उन नित्य एकीभाव से संयुक्त हुए पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ अर्थात् उनके योग की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी मैं अपने हाथ में लेता हूँ। इतना होने पर भी लोग अन्य देवताओं को भजते हैं-
अध्याय-11, श्लोक-54
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप || 54||
तु= परन्तु, परन्तप = हे परन्तप अर्जुन अर्जुन ! अनन्यया, भक्त्या अनन्यभक्ति के द्वारा, एवंविधः = इस प्रकार के रूप वाला, अहम् = मैं, द्रष्टुम् = प्रत्यक्ष देखने के लिए, तत्त्वेन = तत्त्व से, ज्ञातुम् - जानने के लिए, च = तथा, प्रवेष्टुम् = प्रवेश करने के लिए अर्थात् एकीभाव से प्राप्त होने के लिए, च = भी, शक्यः = शक्य हूँ।
हे श्रेष्ठ तपवाले अर्जुन ! अनन्य भक्ति के द्वारा अर्थात् सिवाय मेरे अन्य किसी देवता का स्मरण न करते हुए, अनन्य श्रद्धा से तो मैं इस प्रकार प्रत्यक्षदेखने के लिये, तत्त्व से साक्षात् जानने के लिये तथा प्रवेश करने के लिये भी सुलभ हूँ अर्थात् उनकी प्राप्ति का एकमात्र सुगम माध्यम अनन्य भक्ति है। अन्त में ज्ञान भी अनन्य भक्ति में परिणत हो जाता है। जैसा कि पीछे अध्याय सात में द्रष्टव्य है। पीछे उन्होंने कहा कि तेरे सिवाय न कोई देख सका है और न कोई देख सकेगा, जबकि यहाँ कहते हैं कि अनन्य भक्ति से न केवल मुझेदेखा जा सकता है अपितु साक्षात् जाना और मुझमें प्रवेश भी पाया जा सकता है, अर्थात् अर्जुन अनन्य भक्त का नाम है, एक अवस्था का नाम है। अनुराग ही अर्जुन है।
"उपरोक्त श्लोकों में परमात्मा श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि परमात्मा की आराधना अनन्यभाव से अर्थात् परमात्मा के अतिरिक्त मन, बुद्धि, चित्त श्रद्धा किसी अन्य देवी-देवता, मनुष्य या सृष्टि के पदार्थों में न जाने पाए। परमात्मा की भक्ति अव्यभिचारिणी अर्थात् परमात्मा के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति, वस्तु, देवी-देवता इत्यादि का चिन्तन मन में न आने पाए, इस प्रकार की जाती है। ऐसा करने से उस भक्त की परमात्मा पहले तो सम्पूर्ण कामनाएं पूर्ण करते हैं, फिर उसके सम्पूर्ण विकारों को मिटाते हैं और फिर धीरे से आध्यात्म पथ, परमात्म पथ पर अग्रसर कर देते हैं। अतः हमें परमात्मा के अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवता, मनुष्य अथवा प्रकृति की किसी वस्तु इत्यादि की आराधना नही करनी चाहिए, अपितु एक मात्र परमात्मा की अनन्य भक्ति करनी चाहिए।"
5- भगवद्गीता के अनुसार ध्यान करने की वास्तविक विधि क्या है?
"परमात्मा का ध्यान करने की विधि स्वयं परमात्मा ने ही भगवद्गीता में ही पूर्ण रूप से स्पष्ट किया है। प्रायः ध्यान के नाम पर लोग अलग-अलग विधियाँ, अलग-अलग क्रियाएं बताते हैं। परमात्मा एक है, परमात्मा को प्राप्त करने की विधि अर्थात् ध्यान की विधि भी एक है। परमात्मा का ध्यान करते समय कैसे बैठना चाहिए, ध्यान करते समय शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित्त की स्थिति कैसे होनी चाहिए? यह सब कुछ निम्नलिखित श्लोकों में स्वयं परमात्मा श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है।"
अध्याय-6, श्लोक-11
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् || 11||
शुचौ-शुद्ध, देशे-भूमि में, (जिसके ऊपर क्रमश:), चैलाजिनकुशोत्तरम् = कुशा, मृगछाला और वस्त्र विले हैं, (जो), न= न, अत्युच्छ्रितम् बहुत ऊँचा है (और), न= न, अतिनीचम् = बहुत नीचा, (ऐसे), आत्मनः अपने, आसनम् आसन को, स्थिरम् = स्थिर, प्रतिष्ठाप्य = स्थापन करके। शुद्ध भूमि में कुश, मृगछाल अथवा इससे भी उत्तरोत्तर (रेशमी, ऊनी वस्त्र, तख्त इत्यादि कुछ भी) बिछाकर अपने आसन को न अति ऊँचा, न नीचा, स्थिर स्थापित करे। शुद्ध भूमि का तात्पर्य उसे झाड़ने-बुहारने, सफाई करने से है। जमीन पर कुछ बिछा लेना चाहिये- चाहे मृगछाल हो या चटाई अथवा कोई भी वस्त्र, तख्त जो भी उपलब्ध हो। आसन हिलने-डुलने वाला न हो। न जमीन से बहुत ऊँचा हो और न एकदम नीचा। 'पूज्य महाराज जी' लगभग पाँच इञ्च ऊँचे आसन पर बैठते थे। एक बार भाविकों ने लगभग एक फीट ऊँचा संगमरमर का एक तख्त मँगा दिया। महाराज जी एक दिन तो बैठे, फिर बोले- "नहीं हो ! बहुत ऊँचा हो गया। ऊँचे नहीं बैठे के चाही साधू को, अभिमान होइ जावा करत है। नीचेहू न बैठे के चाही, हीनता आवत है, अपने से घृणा आवत है।" बस, उसको उठवाया और जंगल में एक बगीचा था, वहाँ रखवा दिया। वहाँ न कभी महाराज जाते थे और न अब ही कोई जाता है। यह था उन महापुरुष का क्रियात्मक शिक्षण। इसी प्रकार साधक के लिये भी बहुत ऊँचा आसन नहीं होना चाहिये, नहीं तो भजनपूर्ति बाद में होगी, अहंकार पहले चढ़ बैठेगा। इसके पश्चात्-
अध्याय-6, श्लोक-12
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये || 12||
तत्र = उस, आसने आसन पर, उपविश्य बैठकर, यतचित्तेन्द्रियक्रियः- चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए, मनः = मन को, एकाग्रम् = एकाग्र, कृत्वा = करके, आत्मविशुद्धये = अन्तःकरण की शुद्धि के लिए, योगम् = योग का, युञ्ज्यात् = अभ्यास करे।
उस आसन पर बैठकर (बैठकर ही ध्यान करने का विधान है) मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योगाभ्यास (भगवद्गीता में बतायी गयी यज्ञ की प्रक्रिया) करें। अब बैठने का तरीका बताते हैं-
अध्याय-6, श्लोक-13
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् || 13||
कायशिरोग्रीवम् = काया, सिर और गले को, समम् = समान (एवम्), अचलम् अचल, धारयन् - धारण करते हुए, च = और, स्थिरः = स्थिर होकर, स्वम् अपनी, नासिकाग्रम् - नासिका के अग्र भाग पर, सम्प्रेक्ष्य (इव) = दृष्टि जमाए हुए सा, (अन्य), दिशः दिशाओं को, अनवलोकयन्- न देखता हुआ।
शरीर, गर्दन और सिर को सीधा, अचल स्थिर करके (जैसे कोई पटरी खड़ी कर दी गयी हो, उस प्रकार सीधा) दृढ़ होकर बैठ जाएं और अपनी नासिका के अग्रभाग को देखकर (नासिका की नोक देखते रहने का निर्देश नही है, बल्कि सीधे बैठने पर नाक के सामने जहाँ दृष्टि पड़ती है, वहाँ दृष्टि रहे दाहिने-बाँए देखते रहने कि चंचलता ना रहे) अन्य दिशाओं को न देखते हुए स्थिर होकर बैठे। जो वृद्ध है अथवा किसी कारण पृथ्वी पर नही बैठ सकते, वे कुर्सी इत्यादि पर सीधे बैठ सकते हैं।
अध्याय-6, श्लोक-14
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः || 14||
ब्रह्मचारिव्रते = ब्रह्मचारी के व्रत में, स्थितः स्थित, विगतभी : भयरहित (तथा), प्रशान्तात्मा = भलीभाँति शान्त अन्तःकरण वाला, युक्तः सावधान योगी, मनः = मन को, संयम्य = रोककर, मच्चित्तः = मुझ में चित्तवाला और, मत्परः = मेरे परायण होकर, आसीत = स्थित होवे ।
ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित होकर (प्रायः लोग कहते हैं कि जननेन्द्रिय का संयम ब्रह्मचर्य है; किन्तु महापुरुषों की अनुभूति है कि मन से विषयों का स्मरण करके, आँखों से वैसे दृश्य देखकर, त्वचा से स्पर्श कर, कानों से विषयोत्तेजक शब्द सुनकर जननेन्द्रिय-संयम सम्भव नहीं है। ब्रह्मचारी का वास्तविक अर्थ है- 'ब्रह्म आचरति स ब्रह्मचारी'। ब्रह्म का आचरण है नियत कर्म यज्ञ की प्रक्रिया, जिसे करने वाले 'यान्ति ब्रह्म सनातनम्'- सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाते हैं। इसे करते समय 'स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्'- बाहर के स्पर्श, मन और सभी इन्द्रियों के स्पर्श बाहर ही त्यागकर चित्त को ब्रह्म-चिन्तन में, श्वास-प्रश्वास में, ध्यान में लगाना है। मन ब्रह्म में लगा है तो बाह्य स्मरण कौन करे? यदि बाह्य स्मरण होता है तो अभी मन लगा कहाँ? विकार शरीर में नहीं, मन की तरंगों में रहते हैं। मन ब्रह्माचरण में लगा है तो जननेन्द्रिय-संयम ही नहीं, सकलेन्द्रिय-संयम तक स्वाभाविक हो जाता है। अतः ब्रह्म के आचरण में स्थित रहकर) भयरहित और अच्छी प्रकार शान्त अन्तःकरणवाला मन को संयत रखते हुए, मुझमें लगे हुए चित्त से युक्त मेरे परायण होकर स्थित हो। ऐसा करने का परिणाम क्या होगा?
अध्याय-6, श्लोक-15
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति || 15||
= नियतमानस := वश में किए हुए मनवाला, योगी योगी, एवम् इस प्रकार, आत्मानम् = आत्मा को, सदा = निरन्तर (मुझ परमेश्वर के स्वरूप में), युञ्जन् लगाता हुआ, मत्संस्थाम् = मुझ में रहने वाली, निर्वाणपरमाम् = परमानन्द की पराकाष्ठारूप, शान्तिम्-शान्ति को, अधिगच्छति = प्राप्त होता है।
इस प्रकार अपने आप को निरन्तर उसी चिन्तन में लगाता हुआ संयत मनवाला योगी मेरे में स्थितिरूपी पराकाष्ठा वाली शान्ति को प्राप्त होता है। इसलिए अपने को निरन्तर कर्म (भगवद्गीता में बताया हुआ नियत कर्म) में लगाए। यहाँ यह प्रश्न पूर्णप्राय है। अगले दो श्लोकों में वे बताते हैं कि परमानन्द वाली शान्ति के लिए शारीरिक संयम, युक्ताहार-विहार भी आवश्यक हैं-
अध्याय-6, श्लोक-25
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् || 25 ||
शनैः, शनैः = धीरे-धीरे क्रमशः (अभ्यास करता हुआ), उपरमेत् = उपरति को प्राप्त हो (तथा), धृतिगृहीतया = मन की नियमात्मिका शक्ति, बुद्ध्या बुद्धि के द्वारा, मनः = मन को, आत्मसंस्थम् = परमात्मा में स्थित, कृत्वा = करके (परमात्मा के अतिरिक्त और), किञ्चित् = कुछ, अपि- भी, न, चिन्तयेत् चिन्तन न करे।
क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरामता को प्राप्त हो जाय। चित्त का निरोध और क्रमशः विलय हो जाय। तदनन्तर वह धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके अन्य कुछ भी चिन्तन न करे। निरन्तर लगकर पाने का विधान है। किन्तु आरम्भ में मन लगता नहीं, इसी पर योगेश्वर कहते हैं-
अध्याय-6, श्लोक-26
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥26॥
तत् = यह, अस्थिरम् = स्थिर न रहने वाला (और), चञ्चलम् चञ्चल, मनः = मन, यतः, यतः = जिस-जिस (शब्दादि विषय के निमित्त से संसार में), निश्चरति = विचरता है, ततः, ततः = उस-उस (विषय से), नियम्य रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार आत्मनि = परमात्मा में, एव= ही, वशम् = निरुद्ध, नयेत् करे ।
यह स्थिर न रहनेवाला चंचल मन जिस-जिस कारण से सांसारिक पदार्थों में विचरता है, उस-उस से रोककर बारम्बार अन्तरात्मा में ही निरुद्ध करे। प्रायः लोग कहते हैं कि मन जहाँ भी जाता है जाने दो, प्रकृति में ही तो जायेगा और प्रकृति भी उस ब्रह्म के ही अन्तर्गत है, प्रकृति में विचरण करना ब्रह्म के बाहर नहीं है; किन्तु श्रीकृष्ण के अनुसार यह गलत है। गीता में इन मान्यताओं का किंचित् भी स्थान नहीं है। श्रीकृष्ण का कथन है कि मन जहाँ-जहाँ जाय, जिन माध्यमों से जाय, उन्हीं माध्यमों से रोककर परमात्मा में ही लगावें। मन का निरोध सम्भव है।
अध्याय-6, श्लोक-34
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥34॥
हि= क्योंकि, कृष्ण = हे श्रीकृष्ण ! (यह), मनः = मन, चञ्चलम् = बड़ा चञ्चल, प्रमाथि = प्रमथन स्वभाव बाला, दृढम् बड़ा दृढ (और), बलवत्- बलवान् है। (अतः)= इसलिए, तस्य = उसका, निग्रहम् = वश में करना, अहम् = मैं, वायो : वायु को पकड़ने की, इव- भाँति, सुदुष्करम् अत्यन्त कठिन, मन्ये = मानता।
हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल है, प्रमथन स्वभाववाला है (प्रमथन अर्थात् दूसरे को मथ डालनेवाला), हठी तथा बलवान् है, इसलिये इसे वश में करना मैं वायु की भाँति अतिदुष्कर मानता हूँ। तूफानी हवा और इसको रोकना बराबर है। इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
अध्याय-6, श्लोक-35
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥35॥
महाबाहो = हे महाबाहो ! असंशयम् = निःसन्देह, मनः = मन, चलम् चञ्चल (और), दुर्निग्रहम् = कठिनतासे वश में होने वाला है; तु परन्तु, कौन्तेय हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! (यह), अभ्यासेन = अभ्यास, च = और, वैराग्येण वैराग्य से, गृह्यते = वश में होता है।
महान् कार्य करने के लिये प्रयत्नशील अर्थात् महाबाहु अर्जुन ! निःसन्देह मन चंचल है, बड़ी कठिनाई से वश में होनेवाला है; परन्तु कौन्तेय! यह अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में होता है। जहाँ चित्त को लगाना है, वहाँ स्थिर करने के लिये बार-बार प्रयत्न का नाम अभ्यास है तथा देखी-सुनी विषय-वस्तुओं में (संसार या स्वर्गादि भोगों में) राग अर्थात् लगाव का त्याग वैराग्य है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन को वश में करना कठिन है, किन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यह वश में हो जाता है।
अध्याय-6, श्लोक-27
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ।।27।।
जिसका मन पूर्णरूपेण शान्त है, जो पाप से रहित है, जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, ऐसे ब्रह्म से एकीभूत योगी को सर्वोत्तम आनन्द प्राप्त होता है, जिससे उत्तम कुछ भी नहीं है। इसी पर पुनः बल देते हैं-
अध्याय-6, श्लोक-28
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ।।28।।
पापरहित योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर उस परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति के अनन्त आनन्द की अनुभूति करता है। वह 'ब्रह्मसंस्पर्श' अर्थात् ब्रह्म के स्पर्श और प्रवेश के साथ अनन्त आनन्द का अनुभव करता है। अतः भजन अनिवार्य है। इसी पर आगे कहते हैं-
अध्याय-8, श्लोक-12
मूर्ध्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥12॥
सर्वद्वाराणि = सब इन्द्रियों के द्वारों को, संयम्य रोककर, च तथा, मनः भूषन को, हृदि-ह्रदेश में, निरूध्य- स्थिर करके, (फिर उस जीते हुए मन के द्वारा), प्राणम्- प्राण को, मूर्ध्नि-मस्तक में आधाय-स्थापित करके आत्मनः परमात्मसम्बन्धी, योगधारणाम् = योगधारणा में, आस्थित :- स्थित होकर।
सब इन्द्रियों के दरवाजों को रोककर अर्थात् वासनाओं से अलग रहकर, मन को हृदय में स्थित करके (ध्यान हृदय में ही धरा जाता है, बाहर नहीं। पूजा बाहर नहीं होती), प्राण अर्थात् अन्तःकरण के व्यापार को मस्तिष्क में निरोधकर योग-धारणा (भगवद्गीता में बतायी हुयी यज्ञ की प्रक्रिया- नियत कर्म) में स्थित होकर (योग को धारण किये रहना है, दूसरा तरीका नहीं है)-
अध्याय-8, श्लोक-13
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥13॥
यः = जो पुरुष, ओम् = 'ॐ' इति = इस, एकाक्षरम् = एक अक्षररूप, ब्रह्म = ब्रह्म को, व्याहरन् = उच्चारण करता हुआ (और उसके अर्थस्वरूप), माम् मुझ निर्गुण ब्रह्म का, अनुस्मरन् = चिन्तन करता हुआ, देहमः शरीर को, त्यजन्= त्यागकर, प्रयाति जाता है, सः = वह पुरुष, परमाम्, गतिम् = परमगति को, याति = प्राप्त होता है।
जो पुरुष 'ओम् इति' - ओम् इतना ही, जो अक्षय ब्रह्म का परिचायक है, इसका जप तथा मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग कर जाता है (शरीर का भान अर्थात् आभास नही रह जाता), वह पुरुष परमगति (परमात्मा) को प्राप्त होता है।
"अतः ध्यान करते समय हमें उपरोक्त श्लोकों में बतायी हुई विधि से ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार ध्यान का अभ्यास करने से हमारे भीतर के विकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह, राग, द्वेष, मद, मत्सर, अहंकार, दम्भ, पाखण्ड, तमोगुण, रजोगुण, सतोगुण आदि का धीरे-धीरे नाश होने लगता है। आसुरी गुण नष्ट होने लगते हैं, दैवी गुण बढ़ने लगते हैं। इन्द्रियों, मन और बुद्धि पर हमारा नियन्त्रण हो जाता है, आत्मा का उत्थान होने लगता है।"
6- भगवद्गीता के अनुसार कर्म क्या है?
"समाज में यह बहुत बड़ी भ्रान्ति है कि सांसारिक कर्म अर्थात् व्यवसाय, सेवा, चिकित्सक की सेवा, शिक्षक की सेवा एवं अन्य सामाजिक कर्म ही वह कर्म है, जिसे परमात्मा श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में करने का निर्देश दिया है। सांसारिक कर्म, सामाजिक कर्म परिवर्तनशील हैं। परमात्मा श्रीकृष्ण ने सांसारिक कर्मों को बंधनकारी कर्म बताया है अर्थात् जिन कर्मों के कारण प्राणियों को बार-बार जन्म लेना पड़ता है, दुःख सहना पड़ता है एवं मरना पड़ता है। भगवद्गीता में परमात्मा श्रीकृष्ण ने केवल निष्काम कर्म को कर्म कहा है, जिसे करने से मनुष्य जन्म-मृत्यु के बंधन से, दुःखों से, पाप से मुक्त हो जाता है।"
अध्याय-2, श्लोक-47
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि । || 47 ||
ते = तेरा, कर्मणि = कर्म करने में, एव- ही, अधिकार : अधिकार है (उसके), फलेषु-फलों में, कदाचन = कभी, मा= नहीं। (इसलिए तू), कर्मफलहेतुः कर्मों के फल का हेतु, मा भूः = मत हो (तथा), ते = तेरी, अकर्मणि = कर्म न करने में (भी), सङ्ङ्गः आसक्ति, मा = न, अस्तु = हो।
कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं। ऐसा समझ कि फल है ही नहीं। फल की वासनावाला भी मत हो और कर्म करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो। अब तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उनतालीसवें श्लोक में पहली बार कर्म का नाम लिया; किन्तु यह नहीं बताया कि वह कर्म है क्या और उसे करें कैसे? उस कर्म की विशेषताओं पर प्रकाश डाला कि-
1- अर्जुन ! इस कर्म द्वारा तू कर्मों के बन्धन से अच्छी प्रकार छूट जायेगा।
2- अर्जुन ! इसमें आरम्भ का अर्थात् बीज का नाश नहीं है। आरम्भ कर दें तो प्रकृति के पास कोई उपाय नहीं कि उसे नष्ट कर दे।
3- अर्जुन ! इसमें सीमित फलरूपी दोष भी नहीं है कि स्वर्ग या ऋद्धियों-सिद्धियों में फँसाकर खड़ा कर दे।
4- अर्जुन ! इस कर्म को कार्यरूप देना ही धर्म है। इस धर्म का थोड़ा भी साधन जन्म-मरण के भय से उद्धार कराने वाला होता है।
किन्तु अभी तक उन्होंने यह नहीं बताया कि वह कर्म है क्या? किया कैसे जाय? इसी अध्याय के इकतालीसवें श्लोक (2/41) में उन्होंने बताया- (5-) अर्जुन! इसमें निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही है, क्रिया एक ही है। तो क्या बहुत-सी क्रियावाले भजन नहीं करते? श्रीकृष्ण कहते हैं- वे कर्म नहीं करते। इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओं वाली होती है, इसलिये वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। वे दिखावटी शोभायुक्त वाणी में उन क्रियाओं को व्यक्त भी करते हैं। उनके वाणी की छाप जिनके चित्त पर पड़ जाती है, उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है, वे जन्म-मृत्युरूपी अनन्त फल को प्राप्त होते हैं। अतः निश्चयात्मक क्रिया एक ही है; लेकिन यह नहीं बताया कि वह क्रिया कौन-सी है? सैंतालीसवें श्लोक में उन्होंने कहा- अर्जुन ! कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं। फल की वासनावाला भी मत हो और कर्म करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो अर्थात् निरन्तर करने के लिये उसी में लीन होकर करें; किन्तु यह नहीं बताया कि वह कर्म है क्या? प्रायः इस श्लोक का उद्धरण देकर लोग कहते हैं कि कुछ भी करो, केवल फल की कामना मत करो, हो गया निष्काम कर्मयोग। किन्तु अभी तक श्रीकृष्ण ने बताया ही नहीं कि वह कर्म है कौन-सा, जिसे करें? यहाँ पर केवल कर्म की विशेषताओं पर प्रकाश डाला कि कर्म देता क्या है और कर्म करते समय बरती जानेवाली सावधानियाँ क्या हैं? प्रश्न ज्यों-का-त्यों बना हुआ है, जिसे योगेश्वर आगे अध्याय तीन-चार में स्पष्ट करेंगे।
अध्याय-3, श्लोक-8
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥8॥
त्वम्= तू, नियतम् = शास्त्रविहित, कर्म कर्त्तव्यकर्म, कुरु- कर; हि क्योंकि, अकर्मणः = कर्म न करने की अपेक्षा, कर्म कर्म करना, ज्याय: श्रेष्ठ है, च = तथा, अकर्मणः = कर्म न करने से, ते तेरा, शरीरयात्राः शरीर-निर्वाह, अपि भी, न= नहीं, प्रसिद्ध्येत् = सिद्ध होगा।
अर्जुन ! तू निर्धारित किये हुए कर्म को कर। अर्थात् कर्म तो बहुत से हैं, उनमें से कोई एक चुना हुआ है; उसी नियत कर्म को कर। कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना ही श्रेष्ठ है। इसलिये कि करते रहोगे, थोड़ी भी दूरी तय कर लोगे तो जैसा पीछे बता आये हैं- महान् जन्म-मरण के भय से उद्धार करनेवाला है, इसलिये श्रेष्ठ है। कर्म न करने से तेरी शरीर-यात्रा भी सिद्ध नहीं होगी। शरीर-यात्रा का अर्थ लोग कहते हैं- 'शरीर-निर्वाह'। कैसा शरीर-निर्वाह? क्या आप शरीर हैं? यह पुरुष जन्म-जन्मान्तरों से, युग-युगान्तरों से शरीरों की यात्रा ही तो करता चला आ रहा है। जैसे वस्त्र जीर्ण हुआ तो दूसरा- तीसरा धारण किया, इसी प्रकार कीट-पतंग से मानव तक, ब्रह्मा से लेकर यावन्मात्र जगत् परिवर्तनशील है। ऊपर-नीचे योनियों में बराबर यह जीव शरीरों की ही तो यात्रा कर रहा है। कर्म कोई ऐसी वस्तु (प्रक्रिया) है जो इस यात्रा को सिद्ध कर देती है, पूर्ण कर देती है। मान लें, एक ही जन्म लेना पड़ा तो यात्रा जारी है, अभी तो पथिक चल ही रहा है। वह दूसरे शरीरों की यात्रा कर रहा है। यात्रा पूर्ण तब होती है जब 'गन्तव्य' आ जाय। परमात्मा में स्थिति के अनन्तर इस आत्मा को शरीरों की यात्रा नहीं करनी पड़ती अर्थात् शरीर-त्याग और शरीर-धारण वाला क्रम समाप्त हो जाता है। अतः कर्म कोई ऐसी वस्तु (प्रक्रिया) है कि इस पुरुष को पुनः शरीरों की यात्रा नहीं करनी पड़ती। 'मोक्ष्यसेऽशुभात्' (गीता, ४/१६)- अर्जुन ! इस कर्म को करके तू संसार-बन्धन 'अशुभ' से छूट जायेगा। कर्म कोई ऐसी वस्तु (प्रक्रिया) है जो संसार-बन्धन से मुक्ति दिलाती है। अब प्रश्न खड़ा होता है कि वह निर्धारित कर्म है क्या? इस पर कहते हैं-
अध्याय-3, श्लोक-9
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥9॥
यज्ञार्थात् = यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले, कर्मणः = कर्मों से अतिरिक्त, अन्यत्र = दूसरे कर्मों में (लगा हुआ ही), अयम् = यह, लोकः = मनुष्य समुदाय, कर्मबन्धनः = कर्मों से बँधता है। (इसलिए), कौन्तेय हे अर्जुन ! (तू), मुक्तसङ्गः = आसक्ति से रहित होकर, तदर्थम् = उस यज्ञ के निमित्त (ही भलीभाँति), कर्म कर्त्तव्यकर्म, समाचर = कर ।
अर्जुन ! यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। वह हरकत कर्म है, जिससे यज्ञ पूर्ण होता है। सिद्ध है कि कर्म एक निर्धारित प्रक्रिया है। इसके अतिरिक्त जो कर्म होते हैं, क्या वे कर्म नहीं है? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, वे कर्म नहीं हैं। 'अन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः' इस यज्ञ की प्रक्रिया के अतिरिक्त दुनिया में जो कुछ भी किया जाता है, सारा जगत् जिसमें रात-दिन व्यस्त है वह इसी लोक का एक बन्धन है, न कि कर्म। कर्म तो 'मोक्ष्यसेऽशुभात्'- अशुभअर्थात् संसार-बन्धन से छुटकारा दिलानेवाला है। मात्र यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। वह हरकत कर्म है, जिससे यज्ञ पूरा होता है। अतः अर्जुन ! उस यज्ञ की पूर्ति के लिए संगदोष से अलग रहकर भली प्रकार कर्म का आचरण कर। संगदोष से अलग हुए बिना यह कर्म होता ही नहीं।
अब हम समझ गये कि यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है; किन्तु यहाँ पुनः एक नवीन प्रश्न उत्पन्न हो गया कि वह यज्ञ क्या है, जिसे किया जाय? इसके लिये पहले यज्ञ को न बताकर श्रीकृष्ण बताते हैं कि यज्ञ आया कहाँ से? वह देता क्या है? उसकी विशेषताओं पर प्रकाश डाला और चौथे अध्याय में जाकर स्पष्ट किया कि यज्ञ क्या है, जिसे हम कार्यरूप दें और हमसे कर्म होने लगे। योगेश्वर श्रीकृष्ण की शैली से स्पष्ट है कि जिस वस्तु का चित्रण करना है, वे पहले उसकी विशेषताओं का चित्रण करते हैं जिससे श्रद्धा जागृत हो, तत्पश्चात् वे उसमें बरती जाने वाली सावधानियों पर प्रकाश डालते हैं और अन्त में मुख्य सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं। स्मरण रहे कि यहाँ पर श्रीकृष्ण ने कर्म के दूसरे अंग पर प्रकाश डाला कि कर्म एक निर्धारित क्रिया है। जो कुछ किया जाता है, वह कर्म नहीं है।
अध्याय दो में पहली बार कर्म का नाम लिया, उसकी विशेषताओं पर बल दिया, उसमें बरती जाने वाली सावधानियों पर प्रकाश डाला, लेकिन यह नहीं बताया कि कर्म क्या है? यहाँ अध्याय तीन में बताया कि कोई बगैर कर्म किये नहीं रहता। प्रकृति से पराधीन होकर मनुष्य कर्म करता है। इसके बावजूद भी जो लोग इन्द्रियों को हठ से रोककर मन से विषयों का चिन्तन करते हैं वे दम्भी हैं-दम्भ का आचरण करनेवाले हैं। इसलिये अर्जुन ! मन से इन्द्रियों को समेटकर तू कर्म कर। किन्तु प्रश्न ज्यों-का-त्यों है कि कौन-सा कर्म करे? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन ! तू निर्धारित किये हुए कर्म को कर।
अब प्रश्न उठता है कि निर्धारित कर्म क्या है, जिसे हम करें? तब बताया कि यज्ञ को कार्यरूप देना कर्म है। अब प्रश्न उठता है कि वह यज्ञ क्या है? यहाँ यज्ञ की उत्पत्ति, विशेषता बताकर शान्त हो जायेंगे और आगे अध्याय चार में यज्ञ का निखरा हुआ रूप मिलेगा, जिसे करना कर्म है।
कर्म की यह परिभाषा गीता को समझने की कुंजी है। यज्ञ के अतिरिक्त दुनिया में लोग कुछ-न-कुछ करते ही रहते हैं। कोई खेती करता है तो कोई व्यापार, कोई पदासीन है तो कोई सेवक, कोई अपने को बुद्धिजीवी कहता है तो कोई श्रमजीवी, कोई समाज-सेवा को कर्म मानता है तो कोई देश-सेवा को और इन्हीं कर्मों में लोग सकाम और निष्काम कर्म की भूमिका भी बनाये पड़े हैं। किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं, ये कर्म नहीं हैं। 'अन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः '- यज्ञ की प्रक्रिया के सिवाय जो कुछ भी किया जाता है वह इसी लोक का बंधनकारी कर्म है, न कि मोक्षद कर्म। वस्तुतः यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है।
अध्याय-4, श्लोक-16
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥16॥
कर्म- कर्म, किम् = क्या है? (और), अकर्म अकर्म, किम् = क्या है?- इति = इस प्रकार (इसका), अत्र- निर्णय करने में, कवयः बुद्धिमान् पुरुष, अपि भी, मोहिताः = मोहित = हो जाते हैं। (इसलिए), तत् = वह, कर्म कर्मतत्त्व (मैं), ते तुझे, प्रवक्ष्यामि = भलीभाँति समझाकर कहूँगा, यत् = जिसे, ज्ञात्वा जानकर (तू), अशुभात्- अशुभ से अर्थात् कर्मबन्धन से, मोक्ष्यसे = मुक्त हो जायेगा।
कर्म क्या है और अकर्म क्या है?- इस विषय में बुद्धिमान् पुरुष भी मोहित हैं। इसलिये मैं वह कर्म तेरे लिये अच्छी तरह से कहूँगा, जिसे जानकर तू 'अशुभात् मोक्ष्यसे' अशुभअर्थात् संसार-बन्धन से भली प्रकार छूट जायेगा। कर्म कोई ऐसी वस्तु (प्रक्रिया) है, जो संसार-बन्धन से मुक्ति दिलाती है।
अध्याय-4, श्लोक-17
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥17॥
कर्मणः = कर्म का (स्वरूप) अपि भी, बोद्धव्यम् = जानना चाहिए, च = और, अकर्मणः = अकर्म का (स्वरूप भी), बोद्धव्यम् = जानना चाहिए; च तथा, विकर्मणः = विकर्म का (स्वरूप भी), बोद्धव्यम् = जानना चाहिए; हि क्योंकि, कर्मण : = कर्म की, गतिः गति, गहना = गहन है।
कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये, अकर्म का स्वरूप भी समझना चाहिये और विकर्म अर्थात् विकल्पशून्य विशेष कर्म जो आप्तपुरुषों द्वारा होता है, उसे भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्म की गति (परिणाम) गहन है। कतिपय लोगों ने विकर्म का अर्थ 'निषिद्ध कर्म', 'मन लगाकर किया गया कर्म' इत्यादि किया है। वस्तुतः यहाँ 'वि' उपसर्ग विशिष्टता का द्योतक है। प्राप्ति के पश्चात् महापुरुषों के कर्म विकल्पशून्य होते हैं। आत्मस्थित, आत्मतृप्त, आप्तकाम महापुरुषों को न तो कर्म करने से कोई लाभ है और न छोड़ने से कोई हानि ही है, फिर भी वे पीछेवालों के हित के लिये कर्म करते हैं। ऐसा कर्म विकल्पशून्य है, विशुद्ध है और यही कर्म विकर्म कहलाता है। गीता में यहाँ 'वि' उपसर्ग लगा है जो विशेषता का द्योतक है, निकृष्टता का नहीं। यथा 'योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।' (गीता ५/७)- जो योग से युक्त है वह विशेष रूप से शुद्ध आत्मावाला, विशेष रूप से जीते अन्तःकरणवाला इत्यादि विशेषता के ही द्योतक हैं। इसी प्रकार गीता में स्थान-स्थान पर 'वि' का प्रयोग हुआ है जो विशेष पूर्णता का द्योतक है। इसी प्रकार 'विकर्म' भी विशिष्ट कर्म का द्योतक है जो प्राप्ति के पश्चात् महापुरुषों के द्वारा सम्पादित होता है, जो शुभाशुभ संस्कार नहीं डालता।
"भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के अध्याय-4 के श्लोक सं0-24 से 33 तक 10 श्लोकों में यज्ञ की प्रक्रिया अर्थात् कर्म कैसे किया जाता है उसे अच्छी प्रकार समझाया है। अतः सभी को उन 10 श्लोकों को पढ़कर उसमें बतायी हुयी यज्ञ की प्रक्रिया अर्थात् कर्म का आचरण करना चाहिए। यही भगवद्गीता में परमात्मा श्रीकृष्ण द्वारा बताया हुआ कर्म है, जिससे मनुष्य के भीतर दैवी गुणों- विवेक, वैराग्य, सम, दम, नियम, प्रज्ञा इत्यादि का उत्थान होता है और आसुरी गुणों-काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इत्यादि का विनाश होता है। इस कर्म के द्वारा आत्मा का उत्थान होता है। इस कर्म की पराकाष्ठा पर पहुंचने पर परमात्मा का दर्शन, प्राप्ति और अमृत पद, अविनाशी पद, परमशान्ति की प्राप्ति होती है तथा जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।"
7- परमात्मा की आराधना मे सामग्री कौन सी लगती है, परमात्मा को क्या अर्पित किया जाता है?
अध्याय-9, श्लोक-26
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥26॥
= यः = जो (कोई भक्त), मे = मेरे लिए, भक्त्या = प्रेम से, पत्रम् = पत्र, पुष्पम् पुष्प, फलम् = फल, तोयम् = जल आदि, प्रयच्छति = अर्पण करता है, प्रयतात्मनः = (उस) शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का, भक्त्युपहृतम्- प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ, तत् = वह (पत्र-पुष्पादि), अहम् = मैं, अश्वामि= खाता हूँ।
भक्ति का आरम्भ यहीं से है कि पत्र, पुष्प, फल, जल इत्यादि जो कोई मुझे भक्तिपूर्वक अर्पित करता है, मन से अर्पण करने वाले उस भक्त का वह सब मैं खाता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ।
अध्याय-9, श्लोक-27
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् || 27||
करता है, यत्- जो, अश्नासि = खाता है, यत्-दान देता है, (और), यत्- जो, तपस्यसि = तप कौन्तेय = हे अर्जुन ! (तू), यत्- जो (कर्म), करोषि जो, जुहोषि = हवन करता है, यत् = जो, ददासि करता है, तत् = वह सब, मदर्पणम् = मेरे अर्पण, कुरुष्व = कर ।
अर्जुन ! तू जो कर्म (यथार्थ कर्म) करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, समर्पण करता है, दान देता है, मनसहित इन्द्रियों को जो मेरे अनुरूप तपाता है, वह सब मुझे अर्पण कर अर्थात् मेरे प्रति समर्पित होकर यह सब कर। समर्पण करने से योग के क्षेम की जिम्मेदारी मैं ले लूँगा।
"उपरोक्त श्लोकों से स्पष्ट है कि परमात्मा की आराधना करने में किसी भी प्रकार की सामग्री, द्रव्य अथवा रूपये-पैसै की आवश्यकता नही होती। परमात्मा की आराधना भगवद्गीता में बतायी हुई विधि से एकान्त स्थान पर बैठ कर की जाती है। परमात्मा की तपस्या में श्रद्धापूर्वक लगे हुए सन्यासी, महात्मा अथवा परमात्मा को प्राप्त महापुरूषों को हम श्रद्धापूर्वक पत्र, पुष्प, फल, जल (ग्रहण करने योग्य) जो कुछ अर्पित करते हैं, उनके माध्यम से परमात्मा उसको ग्रहण करते हैं।"
8- परमात्मा की वाणी भगवद्गीता ही मूल धर्म शास्त्र है- वेद, उपनिषद् एवं अन्य धर्म शास्त्र और धर्म ग्रन्थ भगवद्गीता के मूल सिद्धान्तों की विस्तृत व्याख्या है।
अध्याय-15, श्लोक-20
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ।॥20॥
अनघ = हे निष्पाप, भारत = अर्जुन ! इति इस प्रकार, इदम् = यह, गुह्यतमम् = अति रहस्ययुक्त गोपनीय, शास्त्रम् = शास्त्र, मया = मेरे द्वारा, उक्तम् = कहा गया, एतत् = इसको, बुद्ध्वा = तत्त्व से जानकर (मनुष्य), बुद्धिमान् = ज्ञानवान्, च = और, कृतकृत्यः कृतार्थ, स्यात् = हो जाता है।
हे निष्पाप अर्जुन ! इस प्रकार यह अति गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। इसको तत्त्व से जानकर मनुष्य पूर्णज्ञाता और कृतार्थ हो जाता है। अतः योगेश्वर श्रीकृष्ण की यह वाणी स्वयं में पूर्ण शास्त्र है। श्रीकृष्ण का यह रहस्य अत्यन्त गुप्त था। उन्होंने केवल अनुरागियों को बताया। यह अधिकारी के लिये था, सबके लिये नहीं। किन्तु जब यही रहस्य (शास्त्र) लिखने में आ जाता है, सबके सामने पुस्तक रहती है इसलिये लगता है कि श्रीकृष्ण ने सबको कहा; किन्तु वस्तुतः यह अधिकारी के लिये ही है। श्रीकृष्ण का यह स्वरूप सबके लिये था भी नहीं। कोई उन्हें राजा, कोई दूत, तो कोई यादव ही मानता थाः किन्तु अधिकारी अर्जुन से उन्होंने कोई दुराव नहीं रखा। उसने पाया कि वह परमसत्य पुरुषोत्तम हैं। दुराव रखते तो उसका कल्याण ही न होता। यही विशेषता प्राप्तिवाले प्रत्येक महापुरुष में पायी गयी। रामकृष्ण परमहंसदेव एक बार बहुत प्रसन्न थे। भक्तों ने पूछा- "आज तो आप बहुतप्रसन्न हैं।" वे बोले- "आज मैं 'वह' परमहंस हो गया।" उनके समकालीनकोई अच्छे महापुरुष परमंहस थे, उनकी ओर संकेत किया। कुछ देर बाद वे मन-क्रम-वचन से विरक्ति की आशा से अपने पीछे लगे साधकों से बोले-"देखो, अब तुम लोग सन्देह न करना। मैं वही राम हूँ जो त्रेता में हुए थे, वही कृष्ण हूँ जो द्वापर में हुए थे। मैं उन्हीं की पवित्र आत्मा हूँ, वही स्वरूप हूँ। यदि पाना है तो मुझे देखो।
ठीक इसी प्रकार 'पूज्य गुरु महाराज' भी सबके सामने कहा करते थे- "हो, हम भगवान के दूत हैं। जे सचहूँ का सन्त है, वह भगवान का दूत है। हमारे द्वारा ही उनका सन्देशा मिलता है।"पूज्य महाराज जी' सबसे तो इतना ही कहते थे- न किसी विचार का खण्डन, न मण्डन किन्तु जो विरक्ति में पीछे लगे थे, उनसे कहते थे- "केवल मेरे स्वरूप को देखो। यदि तुम्हें उस परमतत्त्व की चाह है तो मुझे देखो, सन्देह मत करो।" बहुतों ने सन्देह किया तो उनको अनुभव में दिखाकर, डॉट-फटकारकर, उन बाह्य विचारों से हटाकर, जिनमें योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार (अध्याय २/४०-४३) अनन्त पूजा-पद्धतियाँ हैं, अपने स्वरूप में लगाया। वे अद्यावधि महापुरुष के रूप में अवस्थित हैं।
इसी प्रकार श्रीकृष्ण की अपनी स्थिति गोपनीय तो थी; किन्तु अपने अनन्य भक्त पूर्ण अधिकारी अनुरागी अर्जुन के प्रति उन्होंने उसे प्रकाशित किया। हर भक्त के लिये सम्भव है, महापुरुष लाखों को उस रास्ते पर चला देते हैं।
"प्रायः लोग भ्रमित हो जाते हैं कि इतने सारे धर्म शास्त्र हैं, धर्म ग्रन्थ हैं, अतः धर्म को पूरी तरह समझने के लिए उन्हे इन सभी धर्म शास्त्रों को, धर्म ग्रन्थों को पढ़ना पड़ेगा, समझना पड़ेगा। ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति इतने सारे धर्म शास्त्रों को देखकर घबरा जाता है और किसी भी एक शास्त्र को न पढ़ता है न समझता है। जिसके निमित्त हम धर्म का आचरण करते हैं, स्वयं उस परमात्मा ने मनुष्य के लिए धर्म को सम्पूर्ण रूप से स्पष्ट किया है। भगवद्गीता सम्पूर्ण धर्म शास्त्र है। यदि हम भगवद्गीता को भली प्रकार पढ़ लें, समझ लें और उसमे बतायी हुई धर्म की प्रक्रिया का आचरण करें तो हमें किसी अन्य धर्म शास्त्र, धर्म ग्रन्थ की आवश्यकता नही रह जाती।"
9- मनुष्य को आराधना, पूजा एवं ध्यान किस विधि से करना चाहिए?
अध्याय-16, श्लोक-23
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥23॥
यः = जो पुरुष, शास्त्रविधिम् = शास्त्रविधि को, उत्सृज्य त्यागकर, कामकारतः = अपनी इच्छा से मनमाना, वर्तते = आचरण करता है, सः वह, न= न, सिद्धिम् = सिद्धि को, अवाप्नोति = प्राप्त होता है, न= न, पराम् = परम, गतिम् = गति को (और), न= न, सुखम् = सुख को ही।
जो पुरुष उपर्युक्त शास्त्रविधि को त्यागकर वह शास्त्र कोई अन्य नहीं, 'इति गुह्यतमं शास्त्रम्' (१५/२०) गीता स्वयं पूर्णशास्त्र है, जिसे स्वयं श्रीकृष्ण ने बताया है, उस विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से बरतता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही प्राप्त होता है।
अध्याय-16, श्लोक-24
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ।॥24॥
तस्मात् - इससे, ते = तेरे लिए, इह- इस, कार्याकार्यव्यवस्थितौ = कर्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में, शास्त्रम् = शास्त्र (ही), प्रमाणम् = प्रमाण है। (एवम्) = ऐसा, ज्ञात्वा = जानकर (तू), शास्त्रविधानोक्तम् = शास्त्रविधि से नियत, कर्म कर्म (ही), कर्तुम् करने, अर्हसि - योग्य है।
इसलिये अर्जुन ! तेरे लिये इस कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में कि मैं क्या करूँ, क्या न करूँ? - इसकी व्यवस्था में शास्त्र ही एक प्रमाण है। ऐसा जानकर शास्त्रविधि से नियत किये हुए कर्म को ही तुझे करना योग्य है। अध्याय तीन में भी योगेश्वर श्रीकृष्ण ने 'नियतं कुरु कर्म त्वं'- नियत कर्म पर बल दिया और बताया कि यज्ञ की प्रक्रिया ही वह नियत कर्म है और वह यज्ञ आराधना की विधि-विशेष का चित्रण है, जो मन का सर्वथा निरोध करके शाश्वत ब्रह्म में प्रवेश दिलाता है। यहाँ उन्होंने बताया कि काम, क्रोध और लोभ नरक के तीन प्रमुख द्वार हैं। इन तीनों को त्याग देने पर ही उस कर्म का (नियत कर्म का) आरम्भ होता है, जिसे मैंने बार-बार कहा, जो परमश्रेय-परमकल्याण दिलानेवाला आचरण है। बाहर सांसारिक कार्यों में जो जितना व्यस्त है, उतना ही अधिक काम, क्रोध और लोभ उसके पास सजा- सजाया मिलता है। कर्म कोई ऐसी वस्तु है कि काम, क्रोध और लोभ को त्याग देने पर ही उसमें प्रवेश मिलता है, कर्म आचरण में ढल पाता है। जो उस विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से आचरण करता है, उसके लिये सुख, सिद्धि अथवा परमगति कुछ भी नहीं है। अब कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही एकमात्र प्रमाण है।
अतः शास्त्रविधि के ही अनुसार तुझे कर्म करना उचित है और वह शास्त्र है 'गीता'।
"अतः हम सभी को भगवद्गीता में बतायी हुई विधि के अनुसार ही जप, तप, ध्यान, यज्ञ, पूजा, आराधना करनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अथवा कोई तथाकथित धार्मिक पुस्तक हमें गीता में बतायी हुई विधि से भिन्न कुछ और धर्म बताता है तो वह धर्म नही अधर्म है, उसका अनुशरण करने पर हमारा पतन ही होगा उत्थान नही होगा।"
10- भगवद्गीता के अनुसार धर्म क्या है?
अध्याय-9, श्लोक-2
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् || 2||
इदम् = यह विज्ञानसहित ज्ञान, राजविद्या= सब विद्याओं का राजा, राजगुह्यम् = सब गोपनीयों का राजा, पवित्रम्- अति पवित्र, उत्तमम्- अति उत्तम, प्रत्यक्षावगमम् = प्रत्यक्ष फलवाला, धर्म्यम् -धर्मयुक्त, कर्तुम्- साधन करने में, सुसुखम् बड़ा सुगम (और), अव्ययम् = अविनाशी है।
विज्ञान से संयुक्त यह ज्ञान सभी विद्याओं का राजा है। विद्या का अर्थ भाषा-ज्ञान अथवा शिक्षा नहीं है। 'विद्या हि का ब्रह्मगति प्रदाया।', 'सा विद्या या विमुक्तये।' विद्या उसे कहते हैं कि जिसके पास आये, उसे उठाकर ब्रह्म-पथ पर चलाते हुए मोक्ष प्रदान कर दे। यदि रास्ते में ऋद्धियों-सिद्धियों अथवा प्रकृति में कहीं उलझ गया तो सिद्ध है कि अविद्या सफल हो गयी। वह विद्या नहीं है।
यह राजविद्या ऐसी है, जो निश्चित कल्याण करनेवाली है। यह सभी गोपनीयों का राजा है। अविद्या और विद्या के अवगुण्ठन का अनावरण होने पर योगयुक्तता के पश्चात् ही इससे मिलन होता है। यह अति पवित्र, उत्तम और प्रत्यक्ष फलवाला है। 'इधर करो, उधर लो' ऐसा प्रत्यक्ष फलवाला है। यह अन्धविश्वास नहीं है कि इस जन्म में साधन करो, फल कभी दूसरे जन्म में मिलेगा। यह परमधर्म परमात्मा से संयुक्त है। विज्ञानसहित यह ज्ञान करने में सरल और अविनाशी है।
अध्याय दो में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन ! इस योग में बीज का नाश नहीं होता। इसका थोड़ा भी साधन जन्म-मरण के महान् भय से उद्धार कर देता है। छठें अध्याय में अर्जुन ने पूछा- भगवन् ! शिथिल प्रयत्नवाला साधक नष्ट-भ्रष्ट तो नहीं हो जाता? श्रीकृष्ण ने बताया- अर्जुन ! पहले तो कर्म समझना आवश्यक है और समझने के बाद थोड़ा भी साधन पार लग गया तो उसका किसी जन्म में कभी विनाश नहीं होता, बल्कि उस थोड़े से अभ्यास के प्रभाव से हर जन्म में वही करता है। अनेक जन्मों के परिणाम में वहीं पहुँच जाता है, जिसका नाम परमगति अर्थात् परमात्मा है। उसी को योगेश्वर श्रीकृष्ण यहाँ भी कहते हैं कि यह साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है; परन्तु इसके लिये श्रद्धा नितान्त आवश्यक है।
अध्याय-18, श्लोक-66
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः || 66||
सर्वधर्मान् = सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्त्तव्य कर्मों को (मुझ में), परित्यज्य त्यागकर - (तू केवल), एकम् = एक, माम् मुझ सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमेश्वर की ही, शरणम्- शरण में, व्रज-= आ जा। अहम् = मैं, त्वा = तुझे, सर्वपापेभ्यः सम्पूर्ण पापों से, मोक्षयिष्यामि = मुक्त कर दूँगा, (तू), मा, शुचः = शोक मत कर।
सम्पूर्ण धर्मों को त्यागकर (अर्थात् मैं ब्राह्मण श्रेणी का कर्त्ता हूँ या शूद्र श्रेणी का, क्षत्रिय हूँ अथवा वैश्य- इसके विचार को त्यागकर) केवल एक मेरी अनन्य शरण को प्राप्त हो। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा। तू शोक मत कर।
इन सब ब्राह्मण, क्षत्रिय इत्यादि वर्णों का विचार न कर (कि इस कर्म- पथ में किस स्तर का हूँ) जो अनन्य भाव से शरण हो जाता है, सिवाय इष्ट के अन्य किसी को नहीं देखता, उसका क्रमशः वर्ण-परिवर्तन, उत्थान तथा पूर्ण पापों से निवृत्ति (मोक्ष) की जिम्मेदारी वह इष्ट सद्गुरु स्वयं अपने हाथों में ले लेते हैं। प्रत्येक महापुरुष ने यही कहा। शास्त्र जब लिखने में आता है तो लगता है कि यह सबके लिये है; किन्तु है वस्तुतः श्रद्धावान् के लिये ही। अर्जुन अधिकारी था, अतः उसे बल देकर कहा।
"उपरोक्त श्लोकों से यह स्पष्ट है कि एक परमात्मा का साक्षात दर्शन करने की विधि, परमात्मा को प्राप्त करने की विधि का नाम धर्म है। सम्पूर्ण श्रद्धा के साथ उसी एक परमात्मा के प्रति समर्पित होना, सम्पूर्ण श्रद्धा के साथ परमात्मा की शरण में जाने का नाम धर्म है। यदि हम सम्पूर्ण श्रद्धा के साथ परमात्मा की शरण में चले जाते हैं, तो परमात्मा ही हमें क्रमशः धर्म की सीढ़ियों पर चलाते हुए, वर्ण परिवर्तन करते हुए सम्पूर्ण पापों से मुक्त करके अमृत पद, अविनाशी पद, परम पद, परम धाम प्रदान कर देते हैं।"
11- भगवद्गीता सुनने, पढ़ने, कहने और भगवद्गीता का प्रचार-प्रसार करने से क्या लाभ मिलता है?
अध्याय-18, श्लोक-68
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः || 68||
यः = जो पुरुष, मयि = मुझमें, पराम्- परम, भक्तिम् = प्रेम, कृत्वा = करके, इमम् = इस, परमम् = परम, गुह्यम् - रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को, मद्भक्तेषु मेरे भक्तों में, अभिधास्यति = कहेगा, (सः)= वह, माम् - मुझको, एव ही, एष्यति = प्राप्त होगा- असंशयः इसमें कोई सन्देह नहीं है।
जो मनुष्य मेरी पराभक्ति को प्राप्त कर इस परम रहस्ययुक्त गीता के उपदेश को मेरे भक्तों में कहेगा, वह निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगा। अर्थात् वह भक्त मुझे ही प्राप्त होगा, जो सुन लेगा; क्योंकि उपदेश को भली प्रकार सुनकर हृदयंगम कर लेगा, तो उस पर चलेगा तथा पार पा जायेगा। अब उस उपदेशकर्ता के लिए कहते हैं-
अध्याय-18, श्लोक-69
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि || 69||
तस्मात् = उससे बढ़कर, मे = मेरा, प्रियकृत्तमः = प्रिय कार्य करने वाला, मनुष्येषु- मनुष्यों में, कश्चित्- कोई, च = भी, न नहीं है; च तथा, भुवि- पृथ्वीभर में, तस्मात् उससे बढ़कर, मे = मेरा, प्रियतरः = प्रिय, अन्यः दूसरा कोई, भविता भविष्य में होगा भी, न= नहीं।
न तो उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई है और न उससे बढ़कर मेरा अत्यन्त प्यारा पृथ्वी में दूसरा कोई होगा। किससे? जो मेरे भक्तों में मेरा उपदेश करेगा, उनको उधर उस पथ पर चलायेगा; क्योंकि कल्याण का यही एक स्त्रोत है, राजमार्ग है। अब देखें अध्ययन-
अध्याय-18, श्लोक-70
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः || 70||
यः = जो पुरुष, इमम् = इस, धर्म्यम्- धर्ममय, आवयोः हम दोनों के, संवादम् = संवादरूप गीताशास्त्रको, अध्येष्यते = पढ़ेगा, तेन = उसके द्वारा, च = भी, अहम् मैं, ज्ञानयज्ञेन = ज्ञानयज्ञ से, इष्टः = पूजित, स्याम् - होऊँगा- इति ऐसा, मे = मेरा, मतिः = मत है।
जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के सम्वाद का 'अध्येष्यते' - भली प्रकार मनन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा अर्थात् ऐसा यज्ञ जिसका परिणाम ज्ञान है, जिसका स्वरूप पीछे बताया गया है, जिसका तात्पर्य है साक्षात्कार के साथ मिलनेवाली जानकारी- ऐसा मेरा निश्चित मत है।
अध्याय-18, श्लोक-71
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् || 71 ||
यः = जो, नरः = मनुष्य, श्रद्धावान् = श्रद्धायुक्त, च = और, अनसूयः दोष-दृष्टि से रहित होकर (इस गीताशास्त्र का), शृणुयात्, अपि श्रवण भी करेगा, सः वह, अपि भी (पापों से), मुक्तः-मुक्त होकर, पुण्यकर्मणाम् = उत्तम कर्म करने वालों के, शुभान् = श्रेष्ठ, लोकान् = लोकों को, प्राप्नुयात् = प्राप्त होगा।
जो पुरुष श्रद्धा से युक्त और ईर्ष्यारहित होकर केवल सुनेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करनेवालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा। अर्थात् करते हुए भी पार न लगे तो सुना भर करें, उत्तम लोक तब भी है; क्योंकि वह चित्त में उन उपदेशों को ग्रहण तो करता है। यहाँ सड़सठ से इकहत्तर तक पाँच श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण ने यह बताया कि गीता का उपदेश अनधिकारियों को नहीं कहना चाहिये; किन्तु जो श्रद्धावान् है उससे अवश्य कहना चाहिये। जो सुनेगा, वह भक्त मुझे प्राप्त होगा; क्योंकि अतिगोपनीय कथा को सुनकर पुरुष चलने लगता है। जो भक्तों में कहेगा, उससे अधिक प्रिय कार्य करनेवाला मेरा कोई नहीं है। जो अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा। यज्ञ का परिणाम ही ज्ञान है। जो गीता के अनुसार कर्म करने में असमर्थ है; किन्तु श्रद्धा से मात्र सुनेगा, वह भी पुण्यलोकों को प्राप्त होगा। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने इसके कहने, सुनने तथा अध्ययन का फल बताया।
"अतः हमें भगवद्गीता सुनना चाहिए, पढ़ना चाहिए एवं सभी मनुष्यों में बिना किसी भेद-भाव के परमात्मा में श्रद्धा उत्पन्न करके उनमें भगवद्गीता के उपदेश का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। भगवद्गीता का प्रचार-प्रसार करने वाला व्यक्ति परमात्मा का सबसे श्रेष्ठ भक्त है ऐसा स्वयं परमात्मा श्रीकृष्ण ने उपरोक्त श्लोकों में स्पष्ट कहा है।"
12- भगवद्गीता का उपदेश सुनकर अर्जुन को क्या प्राप्त हुआ और अर्जुन ने क्या निश्चय किया?
अध्याय-18, श्लोक-73
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव || 73||
अच्युत = हे अच्युत ! त्वत्प्रसादात्- आपकी कृपा से, (मम) मेरा, मोहः मोह, नष्टः = नष्ट हो गया (और), मया = मैंने, स्मृतिः स्मृति, लब्धा प्राप्त कर ली है, (अब मैं), गतसन्देहः-संशयरहित होकर, स्थितः स्थित, अस्मि हूँ, (अतः), तव आपकी, वचनम् = आज्ञा का, करिष्ये- पालन करूंगा।
अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है। मुझे स्मृति प्राप्त हुई है। (जो रहस्यमय ज्ञान मनु ने स्मृति-परम्परा से चलाया, उसी को अर्जुन ने प्राप्त कर लिया।) अब मैं संशयरहित हुआ स्थित हूँ और आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। जबकि सैन्य निरीक्षण के समय दोनों ही सेनाओं में स्वजनों को देख अर्जुन व्याकुल हो गया था। उसने निवेदन किया- गोविन्द ! स्वजनों को मार कर हम कैसे सुखी होंगे? ऐसे युद्ध से शाश्वत कुलधर्म नष्ट हो जायेगा, पिण्डोदक-क्रिया लुप्त हो जायेगी, वर्णसंकर उत्पन्न होगा। हमलोग समझदार होकर भी पाप करने को उद्यत हुए हैं। क्यों न इससे बचने के लिये उपाय करें? शस्त्रधारी ये कौरव मुझ शस्त्ररहित को रण में मार डालें, वह मरना भी श्रेयस्कर है। गोविन्द ! मैं युद्ध नहीं करूँगा कहता हुआ वह रथ के पिछले भाग में बैठ गया था।
इस प्रकार गीता में अर्जुन ने योगेश्वर श्रीकृष्ण के समक्ष प्रश्न-परिप्रश्नों की श्रृंखला खड़ी कर दी। जैसे- अध्याय २/७- वह साधन मेरे प्रति कहिये जिससे मैं परमश्रेय को प्राप्त हो जाऊँ? २/५४-स्थितप्रज्ञ महापुरुष के लक्षण क्या है? ३/१- जब आपकी दृष्टि में ज्ञानयोग श्रेष्ठ है तो मुझे भयंकर कर्मों में क्यों लगाते हैं? ३/३६- मनुष्य न चाहता हुआ भी किसकी प्रेरणा से पाप का आचरण करता है? ४/४- आपका जन्म तो अब हुआ है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है, तो मैं यह कैसे मान लूँ कि कल्प के आदि में इस योग को आपने सूर्य के प्रति कहा था? ५/१- कभी आप संन्यास की प्रशंसा करते हैं तो कभी निष्काम कर्म की। इनमें से एक निश्चय करके कहिये जिससे मैं परमश्रेय को प्राप्त कर लूँ? ६/३५- मन चंचल है, फिर शिथिल प्रयत्नवाला श्रद्धावान् पुरुष आपको न प्राप्त होकर किस दुर्गति को प्राप्त होता है? ८/१-२- गोविन्द। जिसका आपने वर्णन किया, वह ब्रह्म क्या है? वह अध्यात्म क्या है? अधिदैव, अधिभूत क्या है? इस शरीर में अधियज्ञ कौन है? वह कर्म क्या है? अन्त समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं? सात प्रश्न किये। अध्याय १०/ १७ में अर्जुन ने जिज्ञासा की कि निरन्तर चिन्तन करता हुआ मैं किन-किन भावों द्वारा आपका स्मरण करूँ? ११/४ में उसने निवेदन किया कि जिन विभूतियों का आपने वर्णन किया उन्हें मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ। १२/१-जो अनन्य श्रद्धा से लगे हुए भक्तजन भली प्रकार आपकी उपासना करते हैं और दूसरे जो अक्षर अव्यक्त की उपासना करते हैं, इन दोनों में उत्तम योगवेत्ता कौन है? १४/२१- तीनों गुणों से अतीत हुआ पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है तथा मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है? १७/१- जो मनुष्य उपरोक्त शास्त्रविधि को त्यागकर किन्तु श्रद्धा से युक्त होकर यजन करते हैं उनकी कौन-सी गति होती है? और १८/१ हे महाबाहो ! मैं त्याग और संन्यास के यथार्थ स्वरूप को पृथक् पृथक् जानना चाहता हूँ।
इस प्रकार अर्जुन प्रश्न करता गया। जो वह नहीं कर सकता था उन गोपनीय रहस्यों को भगवान ने स्वयं दर्शाया। इनका समाधान होते ही वह प्रश्नों से विरत हो गया और बोला- गोविन्द ! अब मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। वस्तुतः ये प्रश्न मानवमात्र के लिये हैं। इन सभी प्रश्नों के समाधान के बिना कोई भी साधक श्रेय-पथ पर अग्रसर नहीं हो सकता। अतः सद्गुरु के आदेश का पालन करने के लिये, श्रेय-पथ पर अग्रसर होने के लिये सम्पूर्ण गीता का श्रवण अति आवश्यक है। अर्जुन का समाधान हो गया। साथ ही योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निःसृत वाणी का उपसंहार हुआ।
"यदि हम भी भगवद्गीता का उपदेश सुनेंगे, पढ़ेंगें एवं भगवद्गीता में बतायी हुई विधि से धर्म का आचरण करेंगे तो हमारा भी मोह अर्थात् अज्ञान नष्ट हो जाएगा, हमें भी वह स्मृति ज्ञान प्राप्त होगा, जो महाराज मनु को हुआ था। हमारे भी सम्पूर्ण संदेह-शंसय नष्ट हो जाएंगे, हम भी अर्जुन की तरह स्थिर बुद्धि, स्थित प्रज्ञ हो जाएंगे।"
13- भगवद्गीता के समापन के पश्चात् संजय ने क्या निर्णय दिया?
अध्याय-18, श्लोक-76
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः || 76||
राजन्- हे राजन् ! केशवार्जुनयो : भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन के, इमम् इस (रहस्ययुक्त), पुण्यम् = कल्याणकारक, च और, अद्भुतम् अद्भुत, संवादम् संवाद को, संस्मृत्य, संस्मृत्य - पुनः पुनः स्मरण करके (मैं), मुहुर्मुद्ध बार-बार, हृष्यामि - हर्षित हो रहा हूँ। हे राजन्। केशव और अर्जुन के इस परम कल्याणकारी और अद्भुत सम्वाद को पुनः पुनः स्मरण करके मैं बारम्बार हर्षित हो रहा हूं। अतः इस सम्वाद को सदैव स्मरण करना चाहिये और इसी स्मृति से प्रसन्न रहना चाहिये। अब उनके स्वरूप का स्मरण कर संजय कहते हैं-
अध्याय-18, श्लोक-77
विस्मयो मे महान् राजन्हष्यामि च पुनः पुनः ।।77।।
राजन् = हे राजन् ! हरे :- श्रीहरि के, तत् उस, अति अत्यन्त, अद्भुतम् विलक्षण, रूपम् = रूप को, च = भी, संस्मृत्य, संस्मृत्य पुनः पुनः स्मरण करके, मे मेरे (चित्त में), महान् = महान्, विस्मयः = आश्चर्य (होता है), च और, (अहम्) मैं, पुनः, पुनः बार-बार, हृष्यामि हर्षित हो रहा हूँ।
हे राजन्। हरि के (जो शुभाशुभ सर्व का हरण कर स्वयं शेष रहते हैं, उन हरि के) अति अद्भुत रूप को पुनः पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान् आश्चर्य होता है और मैं बारम्बार हर्षित होता हूँ। इष्ट का स्वरूप बार-बार स्मरण करने की वस्तु है। अन्त में संजय निर्णय देते हैं।
अध्याय-18, श्लोक-78
तत्र श्रीर्विजयो - भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम || 78||
यत्र = जहाँ, योगेश्वरः = योगेश्वर, कृष्ण: भगवान् श्रीकृष्ण हैं (और), यत्र जहाँ, धनुर्धरः = धनुषधारी, पार्थ अर्जुन हैं, तत्र वहीं पर, श्री:- श्री, विजय : विजय, भूतिः विभूति (और), ध्रुवा = अचल, नीतिः नीति है- (इति) ऐसा, मम मेरा, मतिः = मत है।।
हे राजन् । जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन (ध्यान ही धनुष है, इन्द्रियों की दृढ़ता ही गाण्डीव है अर्थात् स्थिरता के साथ ध्यान धरने वाला महात्मा अर्जुन) हैं, वहीं पर 'श्री:'-ऐश्वर्य, विजय-जिसके पीछे हार नहीं है, ईश्वरीय विभूति और चल संसार में अचल रहनेवाली नीति है, ऐसा मेरा मत है। आज तो धनुर्धर अर्जुन है नहीं। यह नीति, विजय-विभूति तो अर्जुन तक सीमित रह गयी। तत्सामयिक थी यह। यह तो द्वापर में ही समाप्त हो गयी। लेकिन ऐसी बात नहीं है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि मैं सबके हृदय-देश में निवास करता हूँ। आपके हृदय में भी वे हैं। अनुराग ही अर्जुन है। अनुराग आपके अन्तःकरण की इष्टोन्मुखी लगन का नाम है। यदि ऐसा अनुराग आपमें है तो सदैव वास्तविक विजय है और अचल स्थिति दिलानेवाली नीति भी सदैव रहेगी, न कि कभी थी। जब तक प्राणी रहेंगे, परमात्मा का निवास उनके हृदय-देश में रहेगा, विकल आत्मा उसे पाने का इच्छुक होगा और उनमें से जिसके भी हृदय में उसे पाने का अनुराग उमड़ेगा, वही अर्जुन की श्रेणीवाला होगा; क्योंकि अनुराग ही अर्जुन है। अतः मानवमात्र इसका प्रत्याशी बन सकता है।