Sanatan Dharm
Sanatan Dharm
"Sanatan Dharm"- In Shrimadbhagwadgeeta the word Sanatan is used for "Aatma" and "Parmatma". From the Shloks of Bhagwadgeeta described herein below, it becomes clear that "Santan Dharm " is not a section or society of people. "Sanatan Dharm" is a process to experience and achieve "parmatma" . Consequently, a person who knows the process as prescribed in Bhagwadgeeta to experience the "Aatma" and "Parmatma " is follower of "Santan Dharm"" and a "Sanatani" or "Sanatan Dharmi" .
अध्याय 2, श्लोक 24
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च |
नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन: ||
नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन: ||
परमात्मा श्रीकृष्ण ने कहा- यह आत्मा अच्छेद्य है- इसे छेदा नहीं जा सकता, यह अदाह्य है- इसे जलाया नहीं जा सकता, यह अक्लेद्य है- इसे गीला नहीं किया जा सकता, आकाश इसे अपने में समाहित नहीं कर सकता। यह आत्मा निःसन्देह अशोष्य, सर्वव्यापक, अचल, स्थिर रहनेवाला और सनातन है।
अर्जुन ने कहा कि कुलधर्म सनातन है, ऐसा युद्ध करने से सनातन धर्म नष्ट हो जायेगा; किन्तु श्रीकृष्ण ने इसे अज्ञान माना और आत्मा को ही सनातन बताया। आप कौन हैं? सनातन धर्म के अनुयायी। सनातन कौन है? आत्मा। यदि आप आत्मपर्यन्त दूरी तय कराने वाली विधि-विशेष से अवगत नहीं हैं तो आप सनातन धर्म नहीं जानते। इसका कुपरिणाम साम्प्रदायिकता में फँसे धर्मभीरु लोगों को भोगना पड़ रहा है।
जब मैटर (Matter) क्षेत्र में पैदा होने वाली कोई वस्तु इस सनातन का स्पर्श नहीं कर सकती, तो छूने-खाने से सनातन धर्म नष्ट कैसे हो सकता है? यह धर्म नहीं, एक कुरीति-परिस्थिति थी, जिससे भारत में साम्प्रदायिक वैमनस्य बढ़ा, देश का विभाजन हुआ और राष्ट्रीय एकता की आज भी समस्या बनी हुई है।
अर्जुन ने कहा कि कुलधर्म सनातन है, ऐसा युद्ध करने से सनातन धर्म नष्ट हो जायेगा; किन्तु श्रीकृष्ण ने इसे अज्ञान माना और आत्मा को ही सनातन बताया। आप कौन हैं? सनातन धर्म के अनुयायी। सनातन कौन है? आत्मा। यदि आप आत्मपर्यन्त दूरी तय कराने वाली विधि-विशेष से अवगत नहीं हैं तो आप सनातन धर्म नहीं जानते। इसका कुपरिणाम साम्प्रदायिकता में फँसे धर्मभीरु लोगों को भोगना पड़ रहा है।
जब मैटर (Matter) क्षेत्र में पैदा होने वाली कोई वस्तु इस सनातन का स्पर्श नहीं कर सकती, तो छूने-खाने से सनातन धर्म नष्ट कैसे हो सकता है? यह धर्म नहीं, एक कुरीति-परिस्थिति थी, जिससे भारत में साम्प्रदायिक वैमनस्य बढ़ा, देश का विभाजन हुआ और राष्ट्रीय एकता की आज भी समस्या बनी हुई है।
अध्याय 4, श्लोक 31
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम।।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम।।
परमात्मा श्रीकृष्ण ने कहा- कुरुश्रेष्ठ अर्जुन ! 'यज्ञशिष्टामृतभुजो' यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है, जिसे अवशेष छोड़ता है, वह है अमृत। उसकी प्रत्यक्ष जानकारी ज्ञान है। उस ज्ञानामृत को भोगने अर्थात् प्राप्त करने वाले योगीजन 'यान्ति ब्रह्म सनातनम्'-शाश्वत सनातन परब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ कोई ऐसी वस्तु है, जो पूर्ण होते ही सनातन परब्रह्म में प्रवेश दिला देती है। यज्ञ न करें तो आपत्ति क्या है? श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञरहित पुरुष को पुनः यह मनुष्यलोक अर्थात् मानव-शरीर भी सुलभ नहीं होता, फिर अन्य लोक कैसे सुखदायी होंगे? उसके लिये तो तिर्यक योनियाँ सुरक्षित हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। अतः यज्ञ करना मनुष्य मात्र के लिये नितान्त आवश्यक है।
अध्याय 11, श्लोक 18
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे।।
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे।।
अर्जुन ने कहा- भगवन् ! आप जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् अक्षय परमात्मा हैं, आप इस जगत् के परम आश्रय हैं, आप शाश्वत-धर्म के रक्षक हैं तथा आप अविनाशी सनातन पुरुष हैं- ऐसा मेरा मत है। आत्मा का स्वरूप क्या है? शाश्वत है, सनातन है, अव्यक्त रूप है, अविनाशी है। यहाँ श्रीकृष्ण का क्या स्वरूप है? वही शाश्वत, सनातन, अव्यय, अविनाशी अर्थात् प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष भी उसी आत्मभाव में स्थित होता है। तभी तो भगवान और आत्मा एक ही लक्षण वाले हैं।
अध्याय 8, श्लोक 20
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।।
एक तो ब्रह्मा अर्थात् बुद्धि अव्यक्त है, इन्द्रियों से दिखायी नहीं पड़ती और इससे भी परे सनातन अव्यक्त भाव है, जो भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता अर्थात् विद्या में सचेत और अविद्या में अचेत, दिन में उत्पन्न और रात्रि में विलीन भावों वाले अव्यक्त ब्रह्मा के भी मिट जाने पर वह सनातन अव्यक्त भाव मिलता है, जो नष्ट नहीं होता। बुद्धि में होने वाले उक्त दोनों उतार-चढ़ाव जब मिट जाते हैं तब सनातन अव्यक्त भाव मिलता है, जो मेरा परमधाम है। जब सनातन अव्यक्त भाव प्राप्त हो गया तो बुद्धि भी उसी भाव में रंग जाती है, उसी भाव को धारण कर लेती है। इसलिये वह बुद्धि स्वयं तो मिट जाती है और उसके स्थान पर सनातन अव्यक्त भाव ही शेष बचता है।
अध्याय 15, श्लोक 7
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।
'जीवलोके' अर्थात् इस देह में (शरीर ही लोक है) यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है और वही इस त्रिगुणमयी माया में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है।