Afternoon
त्रिकाल सन्ध्या - अपरान्ह - (1:00 बजे) -
अपरान्ह सन्ध्या का समय अपरान्ध में 11:30 बजे से लेकर 1:00 बजे तक होता है। मंदिर एवं आश्रम में सामूहिक अपरान्ह सन्ध्या का आयोजन प्रतिदिन अपरान्ह 01:00 बजे किया जाना उचित होगा।
i) गृह एवं कार्यालय के लिए-
यदि आप अपरान्ह सन्ध्या के समय अपने घर में हैं, अपने कार्यालय में हैं अथवा किसी ऐसे स्थान पर हैं जहाँ आप किसी मन्दिर अथवा आश्रम में सामूहिक आराधना-प्रार्थना में सम्मिलित नही हो सकते तब आपको अपरान्ह सन्ध्या का निम्नवत् अनुष्ठान करना चाहिए-
क) 11 बार ओम का उच्चारण - ओम का उच्चारण करते समय इसी पाठ्यक्रम के अगले पृष्ठ पर वर्णित ध्यान की अवस्था को समझ कर उसी के अनुरूप बैठकर ओम का उच्चारण करें।
ख) लघु प्रार्थना (अध्याय-11, श्लोक-18)- अपरान्ह सन्ध्या के समय यदि आप घर में अथवा कार्यालय में हैं तो परमात्मा की भगवद्गीता में वर्णित निम्नलिखित प्रार्थना करें।
अध्याय-11, श्लोक-18
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥१८।।
त्वम्- आप (ही), वेदितव्यम् = जानने योग्य, परमम् = परम, अक्षरम् = अक्षर अर्थात् परब्रह्म परमात्मा है, त्वम् = आप (ही), अस्य इस, विश्वस्य जगत् के, परम् = परम, निधानम् = आश्रय हैं, त्वम् आप (ही), शाश्वतधर्मगोप्ता = अनादि धर्म के रक्षक हैं (और), त्वम् = आप (ही), अव्ययः अविनाशी, सनातनः सनातन, पुरुषः = पुरुष हैं (ऐसा), मे = मेरा, मतः = मत है।
भगवन् ! आप जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् अक्षय परमात्मा हैं, आप इस जगत् के परम आश्रय हैं, आप शाश्वत-धर्म के रक्षक हैं तथा आप अविनाशी सनातन पुरुष हैं-ऐसा मेरा मत है। आत्मा का स्वरूप क्या है? शाश्वत है, सनातन है, अव्यक्त रूप है, अविनाशी है। यहाँ श्रीकृष्ण का क्या स्वरूप है? वही शाश्वत, सनातन, अव्यय, अविनाशी अर्थात् प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष भी उसी आत्मभाव में स्थित होता है। तभी तो भगवान और आत्मा एक ही लक्षणवाले हैं।
ii) मन्दिर एवं आश्रम के लिए अपरान्ह सन्ध्या विधि-
हम सभी को सम्पूर्ण परिवार के साथ अपने समीप के मन्दिर, आश्रम, पार्क अथवा किसी व्यक्ति के घर पर एकत्रित होकर सामूहिक रूप से अपरान्ह के समय त्रिकाल सन्ध्या (परमात्मा की आराधना-प्रार्थना) का अनुष्ठान निम्न विधि से करना चाहिए:-
क-शंख ध्वनि के पश्चात् सामूहिक रूप से अपरान्ह सन्ध्या का अनुष्ठान करें।
ख- 11 बार ओम का उच्चारण- ओम का उच्चारण करते समय इसी पाठ्यक्रम के अगले पृष्ठ पर वर्णित ध्यान की अवस्था को समझ कर उसी के अनुरूप बैठकर ओम का उच्चारण करें।
ग- तत्पश्चात् भगवद्गीता के पाँच श्लोकों (क्रमशः अध्याय 1 से अध्याय 18 तक) का सामूहिक पाठ अर्थ के साथ करें।
घ- तत्पश्चात् अपरान्ह सन्ध्या के समय भी उपर्युक्त प्रातःकालीन प्रार्थना (अध्याय-11, श्लोक-36 से 46 तक) करें।
अपरान्ह सन्ध्या का समय अपरान्ध में 11:30 बजे से लेकर 1:00 बजे तक होता है। मंदिर एवं आश्रम में सामूहिक अपरान्ह सन्ध्या का आयोजन प्रतिदिन अपरान्ह 01:00 बजे किया जाना उचित होगा।
i) गृह एवं कार्यालय के लिए-
यदि आप अपरान्ह सन्ध्या के समय अपने घर में हैं, अपने कार्यालय में हैं अथवा किसी ऐसे स्थान पर हैं जहाँ आप किसी मन्दिर अथवा आश्रम में सामूहिक आराधना-प्रार्थना में सम्मिलित नही हो सकते तब आपको अपरान्ह सन्ध्या का निम्नवत् अनुष्ठान करना चाहिए-
क) 11 बार ओम का उच्चारण - ओम का उच्चारण करते समय इसी पाठ्यक्रम के अगले पृष्ठ पर वर्णित ध्यान की अवस्था को समझ कर उसी के अनुरूप बैठकर ओम का उच्चारण करें।
ख) लघु प्रार्थना (अध्याय-11, श्लोक-18)- अपरान्ह सन्ध्या के समय यदि आप घर में अथवा कार्यालय में हैं तो परमात्मा की भगवद्गीता में वर्णित निम्नलिखित प्रार्थना करें।
अध्याय-11, श्लोक-18
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥१८।।
त्वम्- आप (ही), वेदितव्यम् = जानने योग्य, परमम् = परम, अक्षरम् = अक्षर अर्थात् परब्रह्म परमात्मा है, त्वम् = आप (ही), अस्य इस, विश्वस्य जगत् के, परम् = परम, निधानम् = आश्रय हैं, त्वम् आप (ही), शाश्वतधर्मगोप्ता = अनादि धर्म के रक्षक हैं (और), त्वम् = आप (ही), अव्ययः अविनाशी, सनातनः सनातन, पुरुषः = पुरुष हैं (ऐसा), मे = मेरा, मतः = मत है।
भगवन् ! आप जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् अक्षय परमात्मा हैं, आप इस जगत् के परम आश्रय हैं, आप शाश्वत-धर्म के रक्षक हैं तथा आप अविनाशी सनातन पुरुष हैं-ऐसा मेरा मत है। आत्मा का स्वरूप क्या है? शाश्वत है, सनातन है, अव्यक्त रूप है, अविनाशी है। यहाँ श्रीकृष्ण का क्या स्वरूप है? वही शाश्वत, सनातन, अव्यय, अविनाशी अर्थात् प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष भी उसी आत्मभाव में स्थित होता है। तभी तो भगवान और आत्मा एक ही लक्षणवाले हैं।
ii) मन्दिर एवं आश्रम के लिए अपरान्ह सन्ध्या विधि-
हम सभी को सम्पूर्ण परिवार के साथ अपने समीप के मन्दिर, आश्रम, पार्क अथवा किसी व्यक्ति के घर पर एकत्रित होकर सामूहिक रूप से अपरान्ह के समय त्रिकाल सन्ध्या (परमात्मा की आराधना-प्रार्थना) का अनुष्ठान निम्न विधि से करना चाहिए:-
क-शंख ध्वनि के पश्चात् सामूहिक रूप से अपरान्ह सन्ध्या का अनुष्ठान करें।
ख- 11 बार ओम का उच्चारण- ओम का उच्चारण करते समय इसी पाठ्यक्रम के अगले पृष्ठ पर वर्णित ध्यान की अवस्था को समझ कर उसी के अनुरूप बैठकर ओम का उच्चारण करें।
ग- तत्पश्चात् भगवद्गीता के पाँच श्लोकों (क्रमशः अध्याय 1 से अध्याय 18 तक) का सामूहिक पाठ अर्थ के साथ करें।
घ- तत्पश्चात् अपरान्ह सन्ध्या के समय भी उपर्युक्त प्रातःकालीन प्रार्थना (अध्याय-11, श्लोक-36 से 46 तक) करें।