Who is Arya?
Meaning and Interpretation of the word "Arya"
There is a divisive narrative created by the selfish elements that the people residing in particular region of Bharat are known as "Arya" . This narration is absolutely false and motivated with divisive mindset. "Arya" is a word derived from Bhagwadgeeta and Vedas. This word has nothing to do with the people residing in a particular area of Bharat.
अध्याय 2, श्लोक 2
श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।।
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।।
परमात्मा श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन ! इस विषम स्थल में तुझे यह अज्ञान कहाँ से हो गया? विषम स्थल अर्थात् जिसकी समता का सृष्टि में कोई स्थल है ही नहीं, पारलौकिक है लक्ष्य जिसका, ऐसे निर्विवाद स्थल पर तुझे अज्ञान कहाँ से हुआ? अज्ञान क्यों, अर्जुन तो सनातन-धर्म की रक्षा के लिये कटिबद्ध है। क्या सनातन-धर्म की रक्षा के लिये प्राण-पण से तत्पर होना अज्ञान है? श्रीकृष्ण कहते हैं- हाँ, यह अज्ञान है। न तो सम्भावित पुरुषों द्वारा इसका आचरण किया गया है, न यह स्वर्ग ही देनेवाला है और न यह कीर्ति को ही करनेवाला है। सन्मार्ग पर जो दृढ़तापूर्वक आरूढ़ है, उसे "आर्य" कहते हैं। गीता "आर्य"संहिता है ।
वेद में लिखा है-“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्”- अर्थात् विश्व को "आर्य" बनायें। "आर्य" बनाये जाते हैं, न कि जन्म या स्थान से कोई "आर्य" होता है।
सृष्टि का आदिशास्त्र गीता, उसी का विस्तार वेद , वेद से महात्मा बुद्ध तक सब ने "आर्य" का आशय परमात्मा की ओर उन्मुख प्रवृत्ति माना, गुणवाचक माना, न कि भारत के बाहर से आने वाली कोई जाति ! हाँ भारत में उस परमात्मा की शोध करने वाले अधिक संख्या में थे, इसलिए भारत को कभी "आर्यावर्त भी कहा जाता था। यहाँ हृदयस्थ परमात्मा की शोध करने वाले बहुसंख्या में थे, इस लिए हिन्दुस्थान भी कहलाया। एक परमात्मा के लिए जो हृदय-मन से प्रयत्नशील है, वह "आर्यशोध " पर है, "आर्य" ही है।