Bhagwadgeeta
अध्याय 4, श्लोक 1
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।।१।।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।।१।।
अर्जुन ! मैंने इस अविनाशी योग को कल्प के आदि में विवस्वान् (सूर्य) के प्रति कहा, विवस्वान् ने मनु से और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा। किसने कहा? मैंने। श्रीकृष्ण कौन थे? एक योगी। तत्त्वस्थित महापुरुष ही इस अविनाशी योग को कल्प के आरम्भ में अर्थात् भजन के आरम्भ में विवस्वान् अर्थात् जो विवश हैं, ऐसे प्राणियों से कहता है। सुरा में संचार कर देता है। यहाँ सूर्य एक प्रतीक है; क्योंकि सुरा में ही वह परम प्रकाशस्वरूप है और वहीं उसके पाने का विधान है। वास्तविक प्रकाशदाता (सूर्य) वहीं है।
यह योग अविनाशी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि इसमें आरम्भ का नाश नहीं होता। इस योग का आरम्भ भर कर दें तो यह पूर्णत्व दिलाकर ही शान्त होता है। शरीर का कल्प औषधियों द्वारा होता है; किन्तु आत्मा का भजन से होता है। भजन का आरम्भ ही आत्म-कल्प का आदि है। यह साधन-भजन भी किसी महापुरुष की ही देन है। मोहनिशा में अचेत आदिम मानव, जिसमें
भजन का कोई संस्कार नहीं है, योग के विषय में जिसने कभी सोचा तक नहीं, ऐसा मनुष्य किसी महापुरुष को देखता है तो उनके दर्शनमात्र से, उनकी वाणी से, टूटी-फूटी सेवा और सान्निध्य से योग के संस्कार उसमें संचारित हो जाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी इसी को कहते हैं- 'जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।', 'ते सब भए परम पद जोगू।' (रामचरितमानस, २/२१६/१-२)।
श्रीकृष्ण कहते हैं- यह योग मैंने आरम्भ में सूर्य से कहा। 'चक्षोः सूर्यो अजायत' – महापुरुष के दृष्टि-निक्षेप मात्र से योग के संस्कार सुरा में प्रसारित हो जाते हैं। स्वयंप्रकाश, स्ववश परमेश्वर का निवास सबके हृदय में है। सुरा (श्वास) के निरोध से ही उसकी प्राप्ति का विधान है। सुरा में संस्कारों का सृजन ही सूर्य के प्रति कहना है। समय आने पर यह संस्कार मन में स्फुरित होगा, यही सूर्य का मनु से कहना है। मन में स्फुरित होने पर महापुरुष के उस वाक्य के प्रति इच्छा जाग्रत हो जायेगी। यदि मन में कोई बात है तो उसे पाने की इच्छा अवश्य होगी, यही मनु का इक्ष्वाकु से कहना है। लालसा होगी कि वह नियत कर्म करें जो अविनाशी है, जो कर्म-बन्धन से मोक्ष दिलाता है-ऐसा है तो किया जाय और आराधना गति पकड़ लेती है। गति पकड़कर यह योग कहाँ पहुँचाता है? इस पर कहते हैं-
अध्याय 4, श्लोक 2
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।। २।।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।। २।।
इस प्रकार किसी महापुरुष द्वारा संस्काररहित पुरुषों की सुरा में, सुरा से मन में, मन से इच्छा में और इच्छा तीव्र होकर क्रियात्मक आचरण में ढलकर यह योग क्रमशः उत्थान करते-करते राजर्षि श्रेणी तक पहुँच जाता है, उस अवस्था में जाकर विदित होता है। इस स्तर के साधक में ऋद्धियों-सिद्धियों का संचार होता है। यह योग इस महत्त्वपूर्णकाल में इसी लोक (शरीर) में प्रायः नष्ट हो जाता है। इस सीमा-रेखा को कैसे पार किया जाय? क्या इस विशेष स्थल पर पहुँचकर सभी नष्ट हो जाते हैं? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, जो मेरे आश्रित है, मेरा प्रिय भक्त है, अनन्य सखा है वह नष्ट नहीं होता-
अध्याय 4, श्लोक 3
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ।।३।।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ।।३।।
वह ही यह पुरातन योग अब मैंने तेरे लिये वर्णन किया है; क्योंकि तू मेरा भक्त और सखा है और यह योग उत्तम रहस्यपूर्ण है। अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक था, राजर्षि की अवस्थावाला था, जहाँ ऋद्धियों-सिद्धियों के थपेड़े में साधक नष्ट हो जाता है। इस काल में भी योग कल्याण की मुद्रा में ही है; किन्तु प्रायः साधक यहाँ पहुँचकर लड़खड़ा जाते हैं। ऐसा अविनाशी किन्तु रहस्यमय योग श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, क्योंकि नष्ट होने की अवस्था में अर्जुन था ही। क्यों कहा? इसलिये कि तू मेरा भक्त है, अनन्य भाव से मेरे आश्रित है, प्रिय है, सखा है।
जिस परमात्मा की हमें चाह है, वह (सद्गुरु) परमात्मा आत्मा से अभिन्न होकर जब निर्देशन देने लगे, तभी वास्तविक भजन आरम्भ होता है। यहाँ प्रेरक की अवस्था में परमात्मा और(सद्गुरु)एक दूसरे के पर्याय हैं। जिस सतह पर हम खड़े हैं उसी स्तर पर जब स्वयं प्रभु हृदय में उतर आयें, रोकथाम करने लगें, डगमगाने पर सँभालें, तभी मन वश में हो पाता है- 'तुलसिदास (मन) बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजै।' (विनयपत्रिका, ८९) जब तक इष्टदेव रथी होकर, आत्मा से अभिन्न होकर प्रेरक के रूप में खड़े नहीं हो जाते, तब तक सही मात्रा में प्रवेश ही नहीं होता। वह साधक प्रत्याशी अवश्य है, लेकिन भजन उसके पास कहाँ?
पूज्य गुरुदेव भगवान कहा करते थे- "हो! हम कई बार नष्ट होते-होते बच गये। भगवान ने ही बचा लिया। भगवान ने ऐसे समझाया, यह कहा।" हमने पूछा- "महाराज जी ! क्या भगवान भी बोलते हैं, बातचीत करते हैं? वे बोले- "हाँ हो ! भगवान ऐसे बतियावत हैं जैसे हम-तुम बतियाईं, घण्टों बतियाईं और क्रम न टूटे।" हमें उदासी हुई और आश्चर्य भी कि भगवान कैसे बोलते होंगे, यह तो बड़ी नयी बात है। कुछ देर बाद महाराज जी बोले- "काहे घबड़ात है! तोहूँ से बतियैहैं।" अक्षरशः सत्य था उनका कथन और यही सख्यभाव है। सखा की तरह वे निराकरण करते रहें, तभी इस नष्ट होनेवाली स्थिति से साधक पार हो पाता है।
अभी तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने किसी महापुरुष द्वारा योग का आरम्भ, उसमें आनेवाले व्यवधान और उनसे पार पाने का रास्ता बताया। इस पर अर्जुन ने प्रश्न किया-