Prayer Schedule at Temples and Ashrams
Daily Prayer Schedule
🌅 Pratah Kaleen Sandhya (Morning Prayer)
Practices: Chanting of OM, Bhagavad Gita Path, and Prarthana.
Note: Follow the structured schedule prepared by Adv. Rakesh Kumar.
☀️ Apranh Sandhya (Afternoon Prayer)
Practices: Chanting of OM, Bhagavad Gita Path, and Prarthana.
Note: Continue as per the schedule guided by Adv. Rakesh Kumar.
🌙 Sayam Kaleen Sandhya (Evening Prayer)
Practices: Chanting of OM, Bhagavad Gita Path, and Prarthana.
Note: Conclude the day with devotion as per the defined schedule.
परमात्मा की प्रातःकालीन प्रार्थना
अध्याय 11, श्लोक 36
अर्जुन उवाच स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ।। ३६ ।।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ।। ३६ ।।
हे हृषीकेश ! यह उचित ही है कि आपकी कीर्ति से संसार हर्षित होता है और अनुराग को प्राप्त होता है। आपकी ही महिमा से भयभीत हुए राक्षस दिशाओं में भागते हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय आपकी महिमा को देखकर नमस्कार करते हैं।
अध्याय 11, श्लोक 37
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्ते।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ।। ३७ ।।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ।। ३७ ।।
हे महात्मन् ! ब्रह्मा के भी आदिकर्त्ता और सबसे बड़े आपके लिये ये सब कैसे नमस्कार न करें; क्योंकि हे अनन्त ! हे देवेश ! हे जगन्निवास ! सत्, असत् और उनसे भी परे अक्षर अर्थात् अक्षय स्वरूप आप ही हैं। अर्जुन ने अक्षय स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन किया था। केवल बौद्धिक स्तर पर कल्पना करने या मान लेने मात्र से कोई ऐसी स्थिति नहीं मिलती, जो अक्षय हो। अर्जुन का प्रत्यक्ष दर्शन उसकी आन्तरिक अनुभूति है। उसने सविनय कहा-
अध्याय 11, श्लोक 38
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण- स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ।। ३८ ।।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ।। ३८ ।।
आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं। आप इस जगत् के परम आश्रय और जाननेवाले हैं, जानने योग्य हैं तथा परमधाम हैं। हे अनन्तस्वरूप ! आपसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। आप सर्वत्र हैं।
अध्याय 11, श्लोक 39
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ।। ३९ ।।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ।। ३९ ।।
आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा तथा प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। आपको हजारों बार नमस्कार है। फिर भी बार-बार नमस्कार है। अतिशय श्रद्धा और भक्ति के कारण नमन करते हुए अर्जुन को तृप्ति नहीं हो रही है। वह कहता है-
अध्याय 11, श्लोक 40
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ।।४० ।।
हे अत्यन्त सामर्थ्यवाले! आपको आगे से और पीछे से भी नमस्कार हो। हे सर्वात्मन् ! आपको सब ओर से ही नमस्कार हो; क्योंकि हे अत्यन्त
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ।।४० ।।
पराक्रमशाली ! आप सब ओर से संसार को व्याप्त किये हुए हैं, इसलिये आप ही सर्वरूप और सर्वत्र हैं। इस प्रकार बारम्बार नमस्कार करके भयभीत अर्जुन अपनी भूलों के लिये क्षमायाचना करता है-
अध्याय 11, श्लोक 41
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ।।४१।।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ।।४१।।
आपके इस प्रभाव को न जानते हुए आपको सखा, मित्र मानकर मेरे द्वारा प्रेम अथवा प्रमाद से भी हे कृष्ण!, हे यादव!, हे सखे ! इस प्रकार जो कुछ भी हठपूर्वक कहा गया है
अध्याय 11, श्लोक 42
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ।।४२ ।।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ।।४२ ।।
हे अच्युत ! जो आप हँसी के लिये विहार, शय्या, आसन और भोजनादिकों में अकेले अथवा उन लोगों के सामने भी अपमानित किये गये हैं, वह सब अपराध अचिन्त्य प्रभाववाले आपसे मैं क्षमा कराता हूँ। किस प्रकार क्षमा करें?-
अध्याय 11, श्लोक 43
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ।।४३।।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ।।४३।।
आप इस चराचर जगत् के पिता, गुरु से भी बड़े गुरु और अति पूजनीय हैं। जिसकी कोई प्रतिमा नहीं, ऐसे अप्रतिम प्रभाववाले ! आपके समान तीनों लोकों में दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक कैसे होगा? आप सखा भी नहीं, सखा तो समकक्ष होता है।
अध्याय 11, श्लोक 44
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ।।४४।।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ।।४४।।
आप चराचर के पिता हैं, इसलिये मैं अपने शरीर को भली प्रकार आपके चरणों में रखकर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिये प्रार्थना करता हूँ। हे देव! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रिय स्त्री के अपराधों को क्षमा करता है, वैसे ही आप भी मेरे अपराधों को सहन करने योग्य हैं। अपराध क्या था? हमने कभी हे यादव !, हे सखे !, हे कृष्ण! कहा था। समाज के बीच अथवा एकान्त में कहा था, भोजन के समय अथवा सोने के समय कहा था। क्या कृष्ण कहना अपराध था? काले थे ही, गोरे कैसे कहे जाते? यादव कहना भी अपराध नहीं था; क्योंकि यदुकुल में तो जन्म ही हुआ था। सूखा कहना भी अपराध नहीं था; क्योंकि स्वयं श्रीकृष्ण भी अपने को अर्जुन का सखा मानते थे। जब कृष्ण कहना अपराध ही है, एक बार कृष्ण कहने के लिये अर्जुन अनन्त बार गिड़गिड़ाकर क्षमायाचना कर रहा है, तो जप किसका करें? नाम कौन-सा लें?
वस्तुतः चिन्तन का जैसा विधान स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया है, वैसा ही आप करें। उन्होंने पीछे बताया, 'ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। '- अर्जुन ! 'ॐ' बस इतना ही अक्षय ब्रह्म का परिचायक है, इसका तू जप कर और ध्यान मेरा धर; क्योंकि उस परमभाव में प्रवेश मिल जानें के पश्चात् उन महापुरुष का भी वही नाम है, जो उस अव्यक्त का परिचायक है। प्रभाव देखने पर अर्जुन नें पाया कि ये न तो काले हैं न गोरे, न संखा हैं न यादव, यह तो अक्षय ब्रह्म की स्थितिवाले महात्मा हैं।
सम्पूर्ण गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पाँच बार ओम् के उच्चारण पर बल दिया। अब यदि आपको जप करना है तो कृष्ण-कृष्ण न कहकर ओम् का ही जप करें। प्रायः भाविक लोग कोई-न-कोई रास्ता निकालं लेते हैं। कोई 'ओम्' जपने के अधिकार और अनधिकार की चर्चा से भयभीत है, तो कोई महात्माओं की दुहाई देता है अथवा कोई श्रीकृष्ण ही नहीं, उनसे पहले राधा और गोपियों का नाम भी उनकी शीघ्र प्रसन्नता के लोभ में जपता है। पुरुष श्रद्धामय है इसलिये उसका ऐसा जपना मात्र भावुकता है। यदि आप सचमुच भाविक हैं तो उनके आदेश का पालन करें। वे अव्यक्त में स्थित होते हुए भी आज आपके सामने नहीं हैं लेकिन उनकी वाणी आपके समक्ष है। उनकी आज्ञा का पालन करें अन्यथा आप ही बताइये कि गीता में आपका क्या स्थान हैं? हाँ, इतना अवश्य है कि 'अध्येष्यते च य इमं...... श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।'- जो अध्ययन करता है, सुनता है वह ज्ञान तथा यज्ञ को जान लेता है, शुभ लोकों को पा जाता है। अतः अध्ययन अवश्य करें।
प्राण-अपान के चिन्तन में 'कृष्ण' नाम का क्रम पकड़ में नहीं आता। बहुत से लोग कोरी भावुकतावश केवल 'राधे-राधे' कहने लगे हैं। आजकल अधिकारियों से काम न होने पर उनके सगे-सम्बन्धियों से, प्रेमी या पत्नी से 'सोर्स' लगाकर काम चला लेने की परम्परा है। लोग सोचते हैं कि कदाचित् भगवान के घर में भी ऐसा चलता होगा, अतः उन्होंने 'कृष्ण' कहना बन्द करके 'राधे-राधे' कहना आरम्भ कर दिया। वे कहते हैं- 'राधे-राधे ! श्याम मिला दे।' राधा एक बार बिछुड़ी तो स्वयं श्याम से नहीं मिल पायी, वह आपको कैसे मिला दे? अतः अन्य किसी का कहना न मानकर श्रीकृष्ण के आदेश को आप अक्षरशः मानें, ओम का जप करें। हाँ, यहाँ तक उचित है कि राधा हमारा आदर्श हैं, उतनी ही लगन से हमें भी लगना चाहिये। यदि पाना है तो राधा की तरह विरही बनना है। आगे भी अर्जुन ने 'कृष्ण' कहा। 'कृष्ण' उनका प्रचलित नाम था। ऐसे कई नाम थे, जैसे- 'गोपाल'। बहुत से साधक गुरु-गुरु या गुरु का प्रचलित नाम भावुकतावश जपना चाहते हैं; किन्तु प्राप्ति के पश्चात् प्रत्येक महापुरुष का वही नाम है, जिस अव्यक्त में वह स्थित है। बहुत से शिष्य प्रश्न करते हैं- "गुरुदेव! जब ध्यान आपका करते हैं तो पुराना नाम 'ओम्'
इत्यादि क्यों जपें, 'गुरु-गुरु' अथवा 'कृष्ण-कृष्ण' क्यों न कहें।" किन्तु 'यहाँ योगेश्वर ने स्पष्ट किया कि अव्यक्त स्वरूप में विलय के साथ महापुरुर्ष का भी वही नाम नाम है, जिसमें वह स्थित है। 'कृष्ण' सम्बोधन था, जपने नाम नहीं। का योगेश्वर श्रीकृष्ण से अर्जुन ने अपने अपराधों के लिये क्षमायाचना की, उन्हें स्वाभाविक रूप में आने की प्रार्थना की। श्रीकृष्ण मान गये, सहज हो गये। अर्थात् उसे क्षमा भी कर दिया। उसने निवेदन किया-
अध्याय 11, श्लोक 45
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देवरूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास । । ४५ ।।
तदेव मे दर्शय देवरूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास । । ४५ ।।
अभी तक अर्जुन के समक्ष योगेश्वर विश्वरूप में हैं। अतः वह कहता है कि मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ तथा मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है। पहले तो सखा समझता था, धनुर्विद्या में कदाचित् अपने को कुछ आगे ही पाता था; किन्तु अब प्रभाव देखकर भयभीत हो रहा है। पिछले अध्याय में प्रभाव सुनकर वह अपने को ज्ञानी मानता था। क्या ज्ञानी को कहीं भय होता है? वस्तुतः प्रत्यक्ष दर्शन का प्रभाव ही विलक्षण होता है। सब कुछ सुन और मान लेने के बाद भी सब कुछ चलकर जानना शेष ही रहता है। वह कहता है- पहले न देखे हुए आपके इस रूप को देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ। मेरा मन भय से व्याकुल भी हो रहा है। अतः हे देव! आप प्रसन्न हों। हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप अपने उस रूप को ही मुझे दिखाइये। कौन-सा रूप-
अध्याय 11, श्लोक 46
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त-मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ।। ४६ ।।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ।। ४६ ।।
मैं आपको वैसे ही अर्थात् पहले की ही तरह शिर पर मुकुट धारण किये हुए, हाथ में गदा और चक्र लिये हुए देखना चाहता हूँ। इसलिये हे विश्वरूपे ! हे सहस्रबाहो ! आप अपने उसी चतुर्भुज स्वरूप में होइए। कौन-सा रूप देखना चाहा? चतुर्भुज रूप! अब देखना है कि चतुर्भुज रूप है
परमात्मा की सायं कालीन प्रार्थना
अध्याय 11, श्लोक 15
अर्जुन उवाच पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ- मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ।।१५।।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ- मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ।।१५।।
हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर बैठे हुए ब्रह्मा को, महादेव को, सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ। यह प्रत्यक्ष दर्शन था, कोरी कल्पना नहीं; किन्तु ऐसा तभी सम्भव है जब योगेश्वर, पूर्णत्व प्राप्त महापुरुष हृदय से दृष्टि प्रदान करें। यह साधनगम्य है।
अध्याय 11, श्लोक 16
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ।। १६ ।।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ।। १६ ।।
विश्व के स्वामी ! मैं आपको अनेक हाथ, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपोंवाला देखता हूँ। हे विश्वरूप ! न मैं आपके आदि को, न मध्य को और न अन्त को ही देखता हूँ अर्थात् आपके आदि, मध्य और अन्त का निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ।
अध्याय 11, श्लोक 17
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता- द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ।।१७।।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता- द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ।।१७।।
मैं आपको मुकुटयुक्त, गदायुक्त, चक्रयुक्त, सब ओर से प्रकाशमान तेजपुंज स्वरूप, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश देखने में दुष्कर अर्थात् कठिनाई से देखा जानेवाला और सब ओर से बुद्धि आदि से ग्रहण न हो सकनेवाला अप्रमेय देखता हूँ। इस प्रकार सम्पूर्ण इन्द्रियों से पूर्णतया समर्पित होकर योगेश्वर श्रीकृष्ण को इस रूप में देखकर अर्जुन उनकी स्तुति करने लगा-
अध्याय 11, श्लोक 18
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ।।१८।।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ।।१८।।
भगवन् ! आप जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् अक्षय परमात्मा हैं, आप इस जगत् के परम आश्रय हैं, आप शाश्वत धर्म के रक्षक हैं तथा आप अविनाशी सनातन पुरुष हैं- ऐसा मेरा मत है। आत्मा का स्वरूप क्या है? शाश्वत है, सनातन है, अव्यक्त रूप है, अविनाशी है। यहाँ श्रीकृष्ण का क्या स्वरूप है? वही शाश्वत, सनातन, अव्यय, अविनाशी अर्थात् प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष भी उसी आत्मभाव में स्थित होता है। तभी तो भगवान और आत्मा एक ही लक्षणवाले हैं।
अध्याय 11, श्लोक 19
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य- मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवकां स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।। १९ ।।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवकां स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।। १९ ।।
हे परमात्मन् ! मैं आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त हाथोंवाला (पहले हजारों थे, अब अनन्त हो गये), चन्द्रमा और सूर्यरूपी नेत्रोंवाला (तब तो भगवान काने हो गये। एक आँख चन्द्रमा की तरह क्षीण प्रकाशवाली और दूसरी सूर्य की तरह सतेज। ऐसा कुछ नहीं है। सूर्य के समान प्रकाश प्रदान करनेवाला और चन्द्रमा की तरह शीतलता प्रदान करनेवाला गुण भगवान में में है। है शशि-सूर्य मात्र प्रतीक हैं। अर्थात् चन्द्रमा और सूर्य की दृष्टिवाले) तथा प्रज्वलित अग्निरूपी मुखवाला तथा अपने तेज से इस जगत् को तपाते हुए देखता हूँ।
अध्याय 11, श्लोक 20
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्टवाद्भुतं रूपमुग्रं तेवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ।। २० ।।
दृष्टवाद्भुतं रूपमुग्रं तेवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ।। २० ।।
हे महात्मन् ! अन्तरिक्ष और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एकमात्र आपसे ही परिपूर्ण हैं। आपके इस अलौकिक, भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अत्यन्त व्यथित हो रहे हैं।
अध्याय 11, श्लोक 21
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ।। २१ ।।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ।। २१ ।।
वे देवताओं के समूह आपमें ही प्रवेश कर रहे हैं और कई एक भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके गुणों का गान कर रहे हैं। महर्षि और सिद्धों के समुदाय स्वस्तिवाचन अर्थात् 'कल्याण हो', ऐसा कहते हुए सम्पूर्ण स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं।
अध्याय 11, श्लोक 22
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ।। २२ ।।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ।। २२ ।।
रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, वायुदेव और 'उष्मपाः'- ईश्वरीय ऊष्मा ग्रहण करनेवाले तथा गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय सभी आश्चर्य से आपको देख रहे हैं अर्थात् देखते हुए भी समझ नहीं पा रहे हैं; क्योंकि उनके पास वह दृष्टि ही नहीं है। श्रीकृष्ण ने पीछे बताया कि आसुरी स्वभाववाले मुझे तुच्छ कहकर सम्बोधित करते हैं, सामान्य मनुष्य-जैसा मानते हैं जबकि मैं परमभाव में, परमेश्वर रूप में स्थित हूँ। यद्यपि हूँ मनुष्य-शरीर के आधारवाला। उसी का विस्तार यहाँ है कि वे आश्चर्य से देख रहे हैं, यथार्थतः समझ नहीं पा रहे हैं- नहीं देखते हैं।
अध्याय 11, श्लोक 23
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ।। २३ ।।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ।। २३ ।।
महाबाहु (श्रीकृष्ण महाबाहु हैं और अर्जुन भी। प्रकृति से परे महान् सत्ता में जिसका कार्यक्षेत्र हो, वह महाबाहु है। श्रीकृष्ण महानता के क्षेत्र में पूर्ण हैं, अधिकतम सीमा में हैं। अर्जुन उसी की प्रवेशिका में है, मार्ग में है। मंजिल मार्ग का दूसरा छोर ही तो है।) योगेश्वर ! आपके बहुत मुख और नेत्रोंवाले; बहुत हाथ, जंघा और पैरोंवाले; बहुत उदरोंवाले, अनेक विकराल दाढ़ोंवाले महान् रूप को देखकर सब लोक व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ। अब अर्जुन को कुछ भय हो रहा है कि श्रीकृष्ण इतने महान् हैं।
अध्याय 11, श्लोक24
नभः स्पृश दाप्तमनकवण व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ।। २४ ।।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ।। २४ ।।
विश्व में सर्वत्र अणुरूप से व्याप्त हे विष्णो ! आकाश को स्पर्श किये हुए, प्रकाशमान, अनेक रूपों से युक्त, फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर विशेष रूप से भयभीत अन्तःकरणवाला मैं धैर्य और मन के समाधानरूपी शान्ति को नहीं पा रहा हूँ।
अध्याय 11, श्लोक 25
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ।। २५ ।।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ।। २५ ।।
आपके विकराल दाढ़ोंवाले और कालाग्नि (काल के लिये भी अग्नि है परमात्मा) के समान प्रज्वलित मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जान पा रहा हूँ। चारों ओर प्रकाश देखकर दिशाभ्रम हो रहा है। आपका यह रूप देखते हुए मुझे सुख भी नहीं मिल रहा है। हे देवेश! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न हों।
अध्याय 11, श्लोक 26
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्गैः।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ।। २६ ।।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ।। २६ ।।
वे सब ही धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदायसहित आपमें प्रवेश कर रहे हैं और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण (जिससे अर्जुन बहुत भयभीत था, वह कर्ण) एवं हमारी ओर के भी प्रधान योद्धाओं सहित सब-के-सब-
अध्याय 11, श्लोक 27
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ।। २७।।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ।। २७।।
बड़े वेग से आपके विकराल दाढ़ोंवाले भयानक मुखों में प्रवेश कर रहे हैं तथा उनमें से कितने ही चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दिखायी पड़ रहे हैं। वे किस वेग से प्रवेश कर रहे हैं? अब उनका वेग देखें-
अध्याय 11, श्लोक 28
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ।। २८।।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ।। २८।।
जैसे नदियों के बहुत-से जल-प्रवाह (अपने में विकराल होते हुए भी) समुद्र की ओर दौड़ते हैं, समुद्र में प्रवेश करते हैं, ठीक उसी प्रकार वे शूरवीर मनुष्यों के समुदाय आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। अर्थात् वे अपने में शूरवीर तो हैं; किन्तु आप समुद्रवत् हैं। आपके समक्ष उनका बल अत्यल्प है। वे किसलिये और किस प्रकार प्रवेश कर रहे हैं? इसके लिये उदाहरण प्रस्तुत है-
अध्याय 11, श्लोक 29
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ।। २९ ।।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ।। २९ ।।
जैसे पतंगा नष्ट होने के लिये ही प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब प्राणी भी अपने नाश के लिये आपके मुखों में अत्यन्त बढ़े हुए वेग से प्रवेश कर रहे हैं।
अध्याय 11, श्लोक 30
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता-ल्लोकान्समग्रान्वदनैज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ।। ३० ।।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ।। ३० ।।
आप उन समस्त लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा सब ओर से निगलते हुए चाट रहे हैं, उनका आस्वादन कर रहे हैं। हे व्यापनशील परमात्मन् ! आपकी उग्र प्रभा सम्पूर्ण जगत् को अपने तेज से व्याप्त करके तपा रही है। तात्पर्य यह है कि पहले आसुरी सम्पद् परमतत्त्व में विलीन हो जाती है, उसके पश्चात् दैवी सम्पद् का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता इसलिये वह भी उसी स्वरूप में विलीन हो जाती है। अर्जुन ने देखा कि कौरव-पक्ष, तदनन्तर उसके अपने पक्ष के योद्धा श्रीकृष्ण के मुखों में विलीन होते जा रहे हैं। उसने पूछा-
अध्याय 11, श्लोक 31
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ।। ३१ ।।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ।। ३१ ।।
मुझे बताइये कि भयंकर आकारवाले आप कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ ! आपको नमस्कार है, आप प्रसन्न हों। आदिस्वरूप! मैं आपको भली प्रकार जानना चाहता हूँ (जैसे, आप कौन हैं? क्या करना चाहते हैं?); क्योंकि आपकी प्रवृत्ति अर्थात् चेष्टाओं को नहीं समझ पा रहा हूँ।