अध्याय-17, श्लोक-20

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ।। 20 ।।

दान देना ही कर्त्तव्य है- इस भाव से जो दान देश (स्थान), काल (समयानुकूल) और सत्यपात्र के प्राप्त होने पर बदले में उपकार की भावना से रहित होकर दिया जाता है, वह दान सात्त्विक क गया है।

अध्याय-17, श्लोक-21


यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ।। 21।।

जो दान क्लेशपूर्वक (जो देते नहीं बनता लेकिन देना पड़ रहा है) तथा प्रत्युपकार की भाव से कि यह करूँगा तो यह मिलेगा अथवा फल को उद्देश्य बनाकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।

अध्याय-17, श्लोक-22

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ।। 22 ।।

जो दान बिना सत्कार किये अथवा तिरस्कारपूर्वक झिड़ककर अयोग्य देश-काल में अनधिकारियों को दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है। 'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे-"हो, कुपात्र को दान देने से दाता नष्ट हो जाता है।" ठीक इसी प्रकार श्रीकृष्ण का कहना है कि दान देना ही कर्त्तव्य है। देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर बदले में उपकार न चाहने की भावना से उदारता के साथ दिया जानेवाला दान सात्त्विक है। कठिनाई से निकलनेवाला, बदले में फल की भावना से दिया जानेवाला दान राजस है और बिना सत्कार के, झिड़कियों के साथ प्रतिकूल देश-काल में कुपात्र को दिया जानेवाला दान तामस है, लेकिन है दान ही; किन्तु जो देह, गेह इत्यादि सबके ममत्व को त्यागकर एकमात्र इष्ट पर ही निर्भर है, उसके लिये दान का विधान इससे और उन्नत है- वह है सर्वस्व का समर्पण, सम्पूर्ण वासनाओं से हटकर मन का समर्पण; जैसा कि श्रीकृष्ण ने कहा है- 'मय्येव मन आधत्स्व ।' अतः दान नितान्त आवश्यक है।