परमात्मा की प्रातःकालीन प्रार्थना - प्रातःकाल 5:00 बजे

अध्याय 11, श्लोक 36

अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ।। ३६ ।।
हे हृषीकेश ! यह उचित ही है कि आपकी कीर्ति से संसार हर्षित होता है और अनुराग को प्राप्त होता है। आपकी ही महिमा से भयभीत हुए राक्षस दिशाओं में भागते हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय आपकी महिमा को देखकर नमस्कार करते हैं।

अध्याय 11, श्लोक 37

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसतत्परं यत् ।। ३७ ।।
हे महात्मन् ! ब्रह्मा के भी आदिकर्त्ता और सबसे बड़े आपके लिये ये सब कैसे नमस्कार न करें; क्योंकि हे अनन्त ! हे देवेश ! हे जगन्निवास ! सत्, असत् और उनसे भी परे अक्षर अर्थात् अक्षय स्वरूप आप ही हैं। अर्जुन ने अक्षय स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन किया था। केवल बौद्धिक स्तर पर कल्पना करने या मान लेने मात्र से कोई ऐसी स्थिति नहीं मिलती, जो अक्षय हो। अर्जुन का प्रत्यक्ष दर्शन उसकी आन्तरिक अनुभूति है। उसने सविनय कहा-

अध्याय 11, श्लोक 38

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण-
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ।। ३८ ।।
आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं। आप इस जगत् के परम आश्रय और जाननेवाले हैं, जानने योग्य हैं तथा परमधाम हैं। हे अनन्तस्वरूप ! आपसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। आप सर्वत्र हैं।

अध्याय 11, श्लोक 39

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ।। ३९ ।।
आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा तथा प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। आपको हजारों बार नमस्कार है। फिर भी बार-बार नमस्कार है। अतिशय श्रद्धा और भक्ति के कारण नमन करते हुए अर्जुन को तृप्ति नहीं हो रही है। वह कहता है-

अध्याय 11, श्लोक 40

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ।।४० ।।
हे अत्यन्त सामर्थ्यवाले! आपको आगे से और पीछे से भी नमस्कार हो। हे सर्वात्मन् ! आपको सब ओर से ही नमस्कार हो; क्योंकि हे अत्यन्त पराक्रमशाली ! आप सब ओर से संसार को व्याप्त किये हुए हैं, इसलिये आप ही सर्वरूप और सर्वत्र हैं। इस प्रकार बारम्बार नमस्कार करके भयभीत अर्जुन अपनी भूलों के लिये क्षमायाचना करता है-

अध्याय 11, श्लोक 41

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ।।४१।।
आपके इस प्रभाव को न जानते हुए आपको सखा, मित्र मानकर मेरे द्वारा प्रेम अथवा प्रमाद से भी हे कृष्ण!, हे यादव!, हे सखे ! इस प्रकार जो कुछ भी हठपूर्वक कहा गया है

अध्याय 11, श्लोक 42

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ।।४२ ।।
हे अच्युत ! जो आप हँसी के लिये विहार, शय्या, आसन और भोजनादिकों में अकेले अथवा उन लोगों के सामने भी अपमानित किये गये हैं, वह सब अपराध अचिन्त्य प्रभाववाले आपसे मैं क्षमा कराता हूँ। किस प्रकार क्षमा करें?-

अध्याय 11, श्लोक 43

पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ।।४३।।
आप इस चराचर जगत् के पिता, गुरु से भी बड़े गुरु और अति पूजनीय हैं। जिसकी कोई प्रतिमा नहीं, ऐसे अप्रतिम प्रभाववाले ! आपके समान तीनों लोकों में दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक कैसे होगा? आप सखा भी नहीं, सखा तो समकक्ष होता है।

अध्याय 11, श्लोक 44

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ।।४४।।
आप चराचर के पिता हैं, इसलिये मैं अपने शरीर को भली प्रकार आपके चरणों में रखकर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिये प्रार्थना करता हूँ। हे देव! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रिय स्त्री के अपराधों को क्षमा करता है, वैसे ही आप भी मेरे अपराधों को सहन करने योग्य हैं। अपराध क्या था? हमने कभी हे यादव !, हे सखे !, हे कृष्ण! कहा था। समाज के बीच अथवा एकान्त में कहा था, भोजन के समय अथवा सोने के समय कहा था। क्या कृष्ण कहना अपराध था? काले थे ही, गोरे कैसे कहे जाते? यादव कहना भी अपराध नहीं था; क्योंकि यदुकुल में तो जन्म ही हुआ था। सखा कहना भी अपराध नहीं था; क्योंकि स्वयं श्रीकृष्ण भी अपने को अर्जुन का सखा मानते थे। जब कृष्ण कहना अपराध ही है, एक बार कृष्ण कहने के लिये अर्जुन अनन्त बार गिड़गिड़ाकर क्षमायाचना कर रहा है, तो जप किसका करें? नाम कौन-सा लें? वस्तुतः चिन्तन का जैसा विधान स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया है, वैसा ही आप करें। उन्होंने पीछे बताया, 'ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। '- अर्जुन ! 'ॐ' बस इतना ही अक्षय ब्रह्म का परिचायक है, इसका तू जप कर और ध्यान मेरा धर; क्योंकि उस परमभाव में प्रवेश मिल जानें के पश्चात् उन महापुरुष का भी वही नाम है, जो उस अव्यक्त का परिचायक है। प्रभाव देखने पर अर्जुन ने पाया कि ये न तो काले हैं न गोरे, न सखा हैं न यादव, यह तो अक्षय ब्रह्म की स्थितिवाले महात्मा हैं। सम्पूर्ण गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पाँच बार ओम् के उच्चारण पर बल दिया। अब यदि आपको जप करना है तो कृष्ण-कृष्ण न कहकर ओम् का ही जप करें। प्रायः भाविक लोग कोई-न-कोई रास्ता निकाल लेते हैं। कोई 'ओम्' जपने के अधिकार और अनधिकार की चर्चा से भयभीत है, तो कोई महात्माओं की दुहाई देता है अथवा कोई श्रीकृष्ण ही नहीं, उनसे पहले राधा और गोपियों का नाम भी उनकी शीघ्र प्रसन्नता के लोभ में जपता है। पुरुष श्रद्धामय है इसलिये उसका ऐसा जपना मात्र भावुकता है। यदि आप सचमुच भाविक हैं तो उनके आदेश का पालन करें। वे अव्यक्त में स्थित होते हुए भी आज आपके सामने नहीं हैं लेकिन उनकी वाणी आपके समक्ष है। उनकी आज्ञा का पालन करें अन्यथा आप ही बताइये कि गीता में आपका क्या स्थान है ? हाँ, इतना अवश्य है कि 'अध्येष्यते च य इमं...... श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।'- जो अध्ययन करता है, सुनता है वह ज्ञान तथा यज्ञ को जान लेता है, शुभ लोकों को पा जाता है। अतः अध्ययन अवश्य करें। प्राण-अपान के चिन्तन में 'कृष्ण' नाम का क्रम पकड़ में नहीं आता। बहुत से लोग कोरी भावुकतावश केवल 'राधे-राधे' कहने लगे हैं। आजकल अधिकारियों से काम न होने पर उनके सगे-सम्बन्धियों से, प्रेमी या पत्नी से 'सोर्स' लगाकर काम चला लेने की परम्परा है। लोग सोचते हैं कि कदाचित् भगवान के घर में भी ऐसा चलता होगा, अतः उन्होंने 'कृष्ण' कहना बन्द करके 'राधे-राधे' कहना आरम्भ कर दिया। वे कहते हैं- 'राधे-राधे ! श्याम मिला दे।' राधा एक बार बिछुड़ी तो स्वयं श्याम से नहीं मिल पायी, वह आपको कैसे मिला दे? अतः अन्य किसी का कहना न मानकर श्रीकृष्ण के आदेश को आप अक्षरशः मानें, ओम का जप करें। हाँ, यहाँ तक उचित है कि राधा हमारा आदर्श हैं, उतनी ही लगन से हमें भी लगना चाहिये। यदि पाना है तो राधा की तरह विरही बनना है। आगे भी अर्जुन ने 'कृष्ण' कहा। 'कृष्ण' उनका प्रचलित नाम था। ऐसे कई नाम थे, जैसे- 'गोपाल'। बहुत से साधक गुरु-गुरु या गुरु का प्रचलित नाम भावुकतावश जपना चाहते हैं; किन्तु प्राप्ति के पश्चात् प्रत्येक महापुरुष का वही नाम है, जिस अव्यक्त में वह स्थित है। बहुत से शिष्य प्रश्न करते हैं- "गुरुदेव! जब ध्यान आपका करते हैं तो पुराना नाम 'ओम्' इत्यादि क्यों जपें, 'गुरु-गुरु' अथवा 'कृष्ण-कृष्ण' क्यों न कहें।" किन्तु 'यहाँ योगेश्वर ने स्पष्ट किया कि अव्यक्त स्वरूप में विलय के साथ महापुरुर्ष का भी वही नाम है, जिसमें वह स्थित है। 'कृष्ण' सम्बोधन था, जपने का नाम नहीं। योगेश्वर श्रीकृष्ण से अर्जुन ने अपने अपराधों के लिये क्षमायाचना की, उन्हें स्वाभाविक रूप में आने की प्रार्थना की। श्रीकृष्ण मान गये, सहज हो गये। अर्थात् उसे क्षमा भी कर दिया। उसने निवेदन किया-

अध्याय 11, श्लोक 45

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देवरूपं
प्रसीद देवेश जगन्निवास । । ४५ ।।
अभी तक अर्जुन के समक्ष योगेश्वर विश्वरूप में हैं। अतः वह कहता है कि मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ तथा मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है। पहले तो सखा समझता था, धनुर्विद्या में कदाचित् अपने को कुछ आगे ही पाता था; किन्तु अब प्रभाव देखकर भयभीत हो रहा है। पिछले अध्याय में प्रभाव सुनकर वह अपने को ज्ञानी मानता था। क्या ज्ञानी को कहीं भय होता है? वस्तुतः प्रत्यक्ष दर्शन का प्रभाव ही विलक्षण होता है। सब कुछ सुन और मान लेने के बाद भी सब कुछ चलकर जानना शेष ही रहता है। वह कहता है- पहले न देखे हुए आपके इस रूप को देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ। मेरा मन भय से व्याकुल भी हो रहा है। अतः हे देव! आप प्रसन्न हों। हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप अपने उस रूप को ही मुझे दिखाइये। कौन-सा रूप-

अध्याय 11, श्लोक 46

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त-
मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन
सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ।। ४६ ।।
मैं आपको वैसे ही अर्थात् पहले की ही तरह शिर पर मुकुट धारण किये हुए, हाथ में गदा और चक्र लिये हुए देखना चाहता हूँ। इसलिये हे विश्वरूपे ! हे सहस्रबाहो ! आप अपने उसी चतुर्भुज स्वरूप में होइए।