Evening
त्रिकाल सन्ध्या - सायंकाल - (6:30 बजे) -
3- सायंकालीन सन्ध्या (सायंकाल 6:30 बजे) - सायंकालीन सन्ध्या का समय सायंकाल 5:00 से लेकर सायंकाल 6:30 बजे तक होता है। मंदिर एवं आश्रम में सामूहिक सायंकालीन सन्ध्या का आयोजन प्रतिदिन सायंकाल 6:30 बजे किया जाना उचित होगा।
3- सायंकालीन सन्ध्या (सायंकाल 6:30 बजे) - सायंकालीन सन्ध्या का समय सायंकाल 5:00 से लेकर सायंकाल 6:30 बजे तक होता है। मंदिर एवं आश्रम में सामूहिक सायंकालीन सन्ध्या का आयोजन प्रतिदिन सायंकाल 6:30 बजे किया जाना उचित होगा।
हम सभी को सम्पूर्ण परिवार के साथ अपने समीप के मन्दिर, आश्रम, पार्क अथवा किसी व्यक्ति के घर पर एकत्रित होकर सामूहिक रूप से सन्ध्या कालीन त्रिकाल सन्ध्या (परमात्मा की आराधना-प्रार्थना) का अनुष्ठान निम्न विधि से करना चाहिए:-
क-शंख ध्वनि के पश्चात् सामूहिक रूप से सन्ध्या कालीन त्रिकाल सन्ध्या का अनुष्ठान करें।
ख- 11 बार ओम का उच्चारण - ओम का उच्चारण करते समय इसी पाठ्यक्रम के अगले पृष्ठ पर वर्णित ध्यान की अवस्था को समझ कर उसी के अनुरूप बैठकर ओम का उच्चारण करें।
ग- तत्पश्चात् भगवद्गीता के पाँच श्लोकों (क्रमशः अध्याय 1 से अध्याय 18 तक) का सामूहिक पाठ अर्थ के साथ करें।
घ- तत्पश्चात् सामूहिक रूप से भगवद्गीता में वर्णित परमात्मा की निम्नलिखित प्रार्थना करें।
ङ-किसी कारणवश यदि आप सन्ध्या कालीन सामूहिक त्रिकाल सन्ध्या में सम्मिलित न हो सकें तो अपने घर पर या जिस भी स्थान पर हों वहाँ पर उसका अनुष्ठान करें।
परमात्मा की द्वितीय सर्वोत्कृष्ट प्रार्थना (सायं कालीन प्रार्थना-अध्याय-11 श्लोक सं0-15 से 31 तक)
"परमात्मा के विराट स्वरूप का दर्शन करने के पश्चात् भयभीत, कांपते हुए अर्जुन ने श्रद्धापूर्वक गदगद वाणी से अध्याय-11 के श्लोक सं- 36 से 46 तक परमात्म की प्रार्थना किया। अर्जुन की प्रार्थना सुनकर परमात्मा प्रसन्न हुए एवं पुनः अपन सौम्यस्वरूप में आ गए। अतः हम सबको भी परमात्मा की इस सर्वोत्कृष्ट प्रार्थन को भली प्रकार समझ कर स्मृति में धारण कर लेना चाहिए तथा प्रतिदिन स्वयं परमात्मा की यह प्रार्थना करना चाहिए तथा परिवार के एवं समाज के प्रत्येक व्यक्ति को यह प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
अध्याय-11, श्लोक-15
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् || 15 ||
देव = हे देव! (मैं), तव = आपके, देहे शरीर में, सर्वान् सम्पूर्ण, देवान् देवों को, तथा = तथा, भूतविशेषसङ्घान् = अनेक भूतों के समुदायों को, ईशम् = प्रजाओं के स्वामी, कमलासनस्थम् = कमल के आसन पर विराजित, ब्रह्माणम्- ब्रह्मा को, च = और, सर्वान् सम्पूर्ण, ऋषीन् ऋषियों को, च = तथा, दिव्यान् दिव्य, उरगान् = सर्पों को, पश्यामि देखता हूँ।
हे देव। मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर बैठे हुए ब्रह्मा को, महादेव को, सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ। यह प्रत्यक्ष दर्शन था, कोरी कल्पना नहीं; किन्तु ऐसा तभी सम्भव है जब योगेश्वर, पूर्णत्व प्राप्त महापुरुष हृदय से दृष्टि प्रदान करें। यह साधनगम्य है।
अध्याय-11, श्लोक-16
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप || 16||
विश्वेश्वर = हे सम्पूर्ण विश्व के स्वामिन् ! त्वाम् = आपको, अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम् = अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त (तथा), सर्वतः = सब ओर से, अनन्तरूपम् = अनन्त रूपों वाला, पश्यामि = देखता हूँ। विश्वरूप = हे विश्वरूप ! (मै), तव = आपके, न= न, अन्तम् = अन्त को, पश्यामि देखता हूँ, न= न, मध्यम् मध्य को, पुनः = और, न= न, आदिम् आदि को (ही)।
विश्व के स्वामी ! मैं आपको अनेक हाथ, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपोंवाला देखता हूँ। हे विश्वरूप ! न मैं आपके आदि को, न मध्य को और न अन्त को ही देखता हूँ अर्थात् आपके आदि, मध्य और अन्त का निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ।
अध्याय-11, श्लोक-17
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् || 17||
त्वाम् = आपको (मै), किरीटिनम् मुकुटयुक्त, गदिनम् गदायुक्त, च = और, चक्रिणम्- चक्रयुक्त (तथा), सर्वतः सब ओर से, दीप्तिमन्तम् प्रकाशमान, तेजोराशिम् = तेज के पुंज, दीप्तानलार्कडद्युतिम् प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, दुर्निरीक्ष्यम् = कठिनतासे देखे जाने योग्य (और), समन्तात्- सब ओर से, अप्रमेयम् = अप्रमेयस्वरूप, पश्यामि = देखता हूँ।
मैं आपको मुकुटयुक्त, गदायुक्त, चक्रयुक्त, सब ओर से प्रकाशमान तेजपुंज स्वरूप, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश देखने में दुष्कर अर्थात् कठिनाई से देखा जानेवाला और सब ओर से बुद्धि आदि से ग्रहण न हो सकनेवाला अप्रमेय देखता हूँ। इस प्रकार सम्पूर्ण इन्द्रियों से पूर्णतया समर्पित होकर योगेश्वर श्रीकृष्ण को इस रूप में देखकर अर्जुन उनकी स्तुति करने लगा-
अध्याय-11, श्लोक-18
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे || 18||
त्वम् = आप (ही), वेदितव्यम् = जानने योग्य, परमम् परम, अक्षरम् अक्षर अर्थात् परब्रह्म परमात्मा है, त्वम् आप (ही), अस्य इस, विश्वस्य जगत् के, परम् = परम, निधानम् = आश्रय हैं, त्वम् = आप (ही), शाश्वतधर्मगोप्ता = अनादि धर्म के रक्षक हैं (और), त्वम् = आप (ही), अव्ययः अविनाशी, सनातनः सनातन, पुरुष : पुरुष हैं (ऐसा), मे = मेरा, मतः = मत है।
भगवन् ! आप जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् अक्षय परमात्मा हैं, आप इस जगत् के परम आश्रय हैं, आप शाश्वत-धर्म के रक्षक हैं तथा आप अविनाशी सनातन पुरुष हैं-ऐसा मेरा मत है। आत्मा का स्वरूप क्या है? शाश्वत है, सनातन है, अव्यक्त रूप है, अविनाशी है। यहाँ श्रीकृष्ण का क्या स्वरूप है? वही शाश्वत, सनातन, अव्यय, अविनाशी अर्थात् प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष भी उसी आत्मभाव में स्थित होता है। तभी तो भगवान और आत्मा एक ही लक्षण वाले हैं।
अध्याय-11, श्लोक-19
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं-स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् || 19||
त्वाम् - आपको, अनादिमध्यान्तम्- आदि, अन्त और मध्य से रहित, अनन्तवीर्यम् अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्तबाहुम् अनन्त भुजा वाले शशिसूर्यनेत्रम् चन्द्र, सूर्यरूप नेत्रों वाले, दीप्तहुताशवक्त्रम् = प्रज्वलित अग्निरूप मुख वाले (और), स्वतेजसा = अपने तेज से, इदम् = इस, विश्वम् = जगत् को, तपन्तम् = सन्तप्त करते हुए, पश्यामि = देखता हूँ।
हे परमात्मन् ! मैं आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त हाथोंवाला (पहले हजारों थे, अब अनन्त हो गये), चन्द्रमा और सूर्यरूपी नेत्रोंवाला (तब तो भगवान काने हो गये। एक आँख चन्द्रमा की तरह क्षीण प्रकाशवाली और दूसरी सूर्य की तरह सतेज। ऐसा कुछ नहीं है। सूर्य के समान प्रकाश प्रदान करनेवाला और चन्द्रमा की तरह शीतलता प्रदान करनेवाला गुण भगवान में है। शशि-सूर्य मात्र प्रतीक हैं। अर्थात् चन्द्रमा और सूर्य की दृष्टिवाले) तथा प्रज्वलित अग्निरूपी मुखवाला तथा अपने तेज से इस जगत् को तपाते हुए देखता हूँ।
अध्याय-11, श्लोक-20
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् || 20||
महात्मन् - हे महात्मन् ! इदम् = यह, द्यावापृथिव्योः अन्तरम् बीच का स्म्पूर्ण अन्तराल, च तथा, सर्वाः सब, दिशः त्वया = आपसे, हि ही, व्याप्तम् परिपूर्ण है; (तथा), तव द्युलोक और पृथ्वी के दिशाएँ, एकेन = एक, आपके, इदम् = इस, अद्भुतम् = अलौकिक और, उग्रम् भयंकर, रूपम् = रूप को, दृष्ट्वा = देखकर, लोकत्रयम् = तीनों लोक, प्रव्यथितम् = अति व्यथा को प्राप्त हो रहे हैं।
हे महात्मन् ! अन्तरिक्ष और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एकमात्र आपसे ही परिपूर्ण हैं। आपके इस अलौकिक, भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अत्यन्त व्यथित हो रहे हैं।
अध्याय-11, श्लोक-21
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः || 21||
अमी = वे ही, सुरसङ्घाः, हि- देवताओं के समूह, त्वाम् = आप में, विशन्ति- प्रवेश करते हैं (और), केचित्- कुछ, भीताः भयभीत होकर, प्राञ्जलयः हाथ जोड़े (आपके नाम और गुणों का), गृणन्ति = उच्चारण करते हैं, तथा, महर्षिसिद्धसङ्गाः = महर्षि और सिद्धों के समुदाय, स्वस्ति 'कल्याण हो', इति ऐसा, उक्त्वा = कहकर, पुष्कलाभिः = उत्तम-उत्तम, स्तुतिभिः स्तोत्रों द्वारा, त्वाम् आपकी, स्तुवन्ति- स्तुति करते हैं।
वे देवताओं के समूह आपमें ही प्रवेश कर रहे हैं और कई एक भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके गुणों का गान कर रहे हैं। महर्षि और सिद्धों के समुदाय स्वस्तिवाचन अर्थात् 'कल्याण हो', ऐसा कहते हुए सम्पूर्ण स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं।
अध्याय-11, श्लोक-22
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे || 22||
ये = जो, रुद्रादित्याः = ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य, च = तथा, वसवः आठ वसु, साध्या : साध्यगण, विश्वे विश्वेदेव, अश्विनौ अश्विनीकुमार, च तथा, मरुतः = मरुद्गण, च = और, ऊष्मपाः = पितरों का समुदाय, च = तथा, गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः = गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय हैं- (ते) = वे, सर्वे = सब, एव = ही, विस्मिताः = विस्मित होकर, त्वाम् = आपको, वीक्षन्ते देखते हैं। रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, वायुदेव और 'उष्मपाः' ईश्वरीय ऊष्मा ग्रहण करनेवाले तथा गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय सभी आश्चर्य से आपको देख रहे हैं अर्थात् देखते हुए भी समझ नहीं पा रहे हैं; क्योंकि उनके पास वह दृष्टि ही नहीं है। श्रीकृष्ण ने पीछे बताया कि आसुरी स्वभाववाले मुझे तुच्छ कहकर सम्बोधित करते हैं, सामान्य मनुष्य-जैसा मानते हैं जबकि मैं परमभाव में, परमेश्वर रूप में स्थित हूँ। यद्यपि हूँ मनुष्य-शरीर के आधारवाला। उसी का विस्तार यहाँ है कि वे आश्चर्य से देख रहे हैं, यथार्थतः समझ नहीं पा रहे हैं- नहीं देखते हैं।
अध्याय-11, श्लोक-23
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् || 23||
महाबाहो = हे महाबाहो ! ते आपके, बहुवक्त्रनेत्रम् = बहुत मुख और नेत्रों वाले, बहुबाडूरुपादम् = बहुत हाथ, जङ्घा और पैरों वाले, बहूदरम् = बहुत उदरों वाले (और), बहुदंष्ट्राकरालम् = बहुत-सी दाढ़ों के कारण अत्यन्त विकराल, महत्- महान्, रूपम् -रूप को, दृष्ट्वा = देखकर, लोकाः = सब लोग, प्रव्यथिताः = व्याकुल हो रहे हैं, तथा = तथा, अहम् मैं, (अपि) = भी (व्याकुल हो रहा हूँ)।
महाबाहु (श्रीकृष्ण महाबाहु हैं और अर्जुन भी। प्रकृति से परे महान् सत्ता में जिसका कार्यक्षेत्र हो, वह महाबाहु है। श्रीकृष्ण महानता के क्षेत्र में पूर्ण हैं, अधिकतम सीमा में हैं। अर्जुन उसी की प्रवेशिका में है, मार्ग में है। मंजिल मार्ग का दूसरा छोर ही तो है।) योगेश्वर ! आपके बहुत मुख और नेत्रोंवाले; बहुत हाथ, जंघा और पैरोंवाले; बहुत उदरोंवाले, अनेक विकराल दाढ़ोंवाले महान् रूप को देखकर सब लोक व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ। अब अर्जुन को कुछ भय हो रहा है कि श्रीकृष्ण इतने महान् हैं।
अध्याय-11, श्लोक-24
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो || 24||
हि= क्योंकि, विष्णो = हे विष्णो ! नभः स्पृशम् आकाश को स्पर्श करने वाले, दीप्तम् = देदीप्यमान, अनेकवर्णम् = अनेक वर्णों से युक्त (तथा), व्यात्ताननम् = फैलाये हुए मुख (और), दीप्तविशालनेत्रम् - प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त, त्वाम् आपको, दृष्ट्वा = देखकर, प्रव्यथितान्तरात्मा = भयभीत अन्तःकरणवाला (मै), धृतिम् = धीरज, च = और, शमम् = शान्ति, न= नहीं, विन्दामि = पाता हूँ।
विश्व में सर्वत्र अणुरूप से व्याप्त हे विष्णो। आकाश को स्पर्श किये हुए, प्रकाशमान, अनेक रूपों से युक्त, फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर विशेष रूप से भयभीत अन्तःकरणवाला मैं धैर्य और मन के समाधानरूपी शान्ति को नहीं पा रहा हूँ।
अध्याय-11, श्लोक-25
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास || 25||
दंष्ट्राकरालानि = दाढ़ों के कारण विकराल, च = और, कालानलसन्निभानि प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित, ते = आपके, मुखानि = मुखों को, दृष्ट्वा = देखकर (मैं), दिशः = दिशाओं को, न= नहीं, जाने जानता हूँ, च = और, शर्म= सुख, एव = भी, न= नहीं, लभे पाता हूँ। (इसलिए), देवेश हे देवेश ! जगन्निवास = हे जगन्निवास ! (आप), प्रसीद प्रसन्न हों।
आपके विकराल दाड़ोंवाले और कालाग्नि (काल के लिये भी अग्नि है परमात्मा) के समान प्रज्वलित मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जान पा रहा हूँ। चारों ओर प्रकाश देखकर दिशाभ्रम हो रहा है। आपका यह रूप देखते हुए मुझे सुख भी नहीं मिल रहा है। हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न हों।
अध्याय-11, श्लोक-26
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः || 26||
अमी = वे, सर्वे, एव = सभी, धृतराष्ट्रस्य = धृतराष्ट्र के, पुत्राः पुत्र, अवनिपालसङ्घः सह राजाओं के समुदायसहित, त्वाम् आप में, (प्रविशन्ति) = प्रवेश कर रहे हैं, च = और, भीष्मः = भीष्मपितामह, द्रोणः द्रोणाचार्य, तथा = तथा, असौ वह, सूतपुत्रः = कर्ण (और), अस्मदीयैः हमारे पक्ष के, अपि भी, योधमुख्यैः प्रधान योद्धाओं के, सह- सहित (सब-के-सब)। वे सब ही धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदायसहित आपमें प्रवेश कर रहे हैं और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण (जिससे अर्जुन बहुत भयभीत था, वह कर्ण) एवं हमारी ओर के भी प्रधान योद्धाओं सहित सब-के-सब-
अध्याय-11, श्लोक-27
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः || 27||
ते = आपके, दंष्ट्राकरालानि दाढ़ों के कारण विकराल, भयानकानि भयानक, वक्त्राणि = मुखों में, त्वरमाणा :- बड़े वेग से दौड़ते हुए, विशन्ति- प्रवेश कर रहे हैं (और), केचित्-कई एक, चूर्णितै := चूर्ण हुए, उत्तमाङ्गै : सिरों सहित (आपके), दशनान्तरेषु - दाँतों के बीच में, विलग्नाः लगे हुए, सन्दृश्यन्ते दीख रहे हैं। बड़े वेग से आपके विकराल दाढ़ोंवाले भयानक मुखों में प्रवेश कर रहे हैं तथा उनमें से कितने ही चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दिखायी पड़ रहे हैं। वे किस वेग से प्रवेश कर रहे हैं? अब उनका वेग देखें-
अध्याय-11, श्लोक-28
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति || 28||
यथा = जैसे, नदीनाम् नदियों के, बहवः बहुत-से, अम्बुवेगाः जल के प्रवाह (स्वाभाविक ही), समुद्रम् = समुद्र के, एव ही, अभिमुखाः सम्मुख, द्रवन्ति = दौड़ते हैं अर्थात् समुद्र में प्रवेश करते हैं, तथा वैसे ही, अमी वे, नरलोकवीराः = नरलोक के वीर (भी), तव = आपके, अभिविज्वलन्तिः प्रज्वलित, वक्त्राणि मुखों में, विशन्ति = प्रवेश कर रहे हैं।
जैसे नदियों के बहुत-से जल प्रवाह (अपने में विकराल होते हुए भी) समुद्र की ओर दौड़ते हैं, समुद्र में प्रवेश करते हैं, ठीक उसी प्रकार वे शूरवीर मनुष्यों के समुदाय आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। अर्थात् वे अपने में शूरवीर तो हैं; किन्तु आप समुद्रवत् हैं। आपके समक्ष उनका बल अत्यल्प है। वे किसलिये और किस प्रकार प्रवेश कर रहे हैं? इसके लिये उदाहरण प्रस्तुत है-
अध्याय-11, श्लोक-29
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः || 29||
यथा = जैसे, पतङ्गाः = पतङ्ग (मोहवश), नाशाय = नष्ट होने के लिए, प्रदीप्तम् = प्रज्वलित, ज्वलनम्- अग्नि में, समृद्धवेगा : अति वेग से दौड़ते हुए, विशन्ति = प्रवेश करते हैं, तथा = वैसे, एव ही (ये), लोकाः सब लोग, अपि भी, नाशाय = अपने नाश के लिए, तव = आपके, वक्त्राणि मुखों में, समृद्धवेगाः अति वेग से दौड़ते हुए, विशन्ति = प्रवेश कर रहे हैं। जैसे पतंगा नष्ट होने के लिये ही प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब प्राणी भी अपने नाश के लिये आपके मुखों में अत्यन्त बढ़े हुए वेग से प्रवेश कर रहे हैं।
अध्याय-11, श्लोक-30
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो || 30||
समग्रान् = सम्पूर्ण, लोकान् = लोकों को, ज्वलद्भिः प्रज्वलित, वदनैः मुखों द्वारा, ग्रसमानः = ग्रास करते हुए, समन्तात् सब ओर से, लेलिह्यसे- बार-बार चाट रहे हैं, विष्णो- हे विष्णो ! तव आपका, उग्राः उग्र, भासः प्रकाश, समग्रम् = सम्पूर्ण, जगत् = जगत् को, तेजोभिः तेज के द्वारा, आपूर्य = परिपूर्ण करके, प्रतपन्ति = तपा रहा है।
आप उन समस्त लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा सब ओर से निगलते हुए चाट रहे हैं, उनका आस्वादन कर रहे हैं। हे व्यापनशील परमात्मन् ! आपकी उग्र प्रभा सम्पूर्ण जगत् को अपने तेज से व्याप्त करके तपा रही है। तात्पर्य यह है कि पहले आसुरी सम्पद् परमतत्त्व में विलीन हो जाती है, उसके पश्चात् दैवी सम्पद् का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता इसलिये वह भी उसी स्वरूप में विलीन हो जाती है। अर्जुन ने देखा कि कौरव-पक्ष, तदनन्तर उसके अपने पक्ष के योद्धा श्रीकृष्ण के मुखों में विलीन होते जा रहे हैं। उसने पूछा-
अध्याय-11, श्लोक-31
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् || 31||
मे = मुझे, आख्याहि = बतलाइए (कि), भवान् = आप, उग्ररूपः उग्ररूप वाले, कः = कौन हैं? देववर = हे देवों में श्रेष्ठ ! ते आपको, नमः = नमस्कार, अस्तु = हो। (आप), प्रसीद प्रसन्न होइए। आद्यम् = आदिपुरुष, भवन्तम् = आपको (मै), विज्ञातुम् = विशेषरूप से जानना, इच्छामि चाहता हूँ; हि क्योंकि (मैं), तव आपकी, प्रवृत्तिम् = प्रवृत्ति को, न= नहीं, प्रजानामि = जानता।
मुझे बताइये कि भयंकर आकारवाले आप कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ ! आपको नमस्कार है, आप प्रसन्न हों। आदिस्वरूप ! मैं आपको भली प्रकार जानना चाहता हूँ (जैसे, आप कौन हैं? क्या करना चाहते हैं?); क्योंकि आपकी प्रवृत्ति अर्थात् चेष्टाओं को नहीं समझ पा रहा हूँ।